।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण दशमी, वि.सं.–२०७१, गुरुवार
एकादशीव्रत कल है
अलौकिक साधन-भक्ति



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
दार्शनिकोंकी दृष्टिमें उनका अपना मत साध्य हैजो वास्तवमें साध्य न होकर साधन-तत्त्व है* । वास्तविक साध्य (समग्र परमात्मा) में कोई दार्शनिक मतभेद नहीं है । सूक्ष्म अहम् रहनेसे दार्शनिकोंको अपना मत (मार्ग) श्रेष्ठ दीखता है,दूसरेका मत उतना श्रेष्ठलाभदायक नहीं दीखताऔर उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं हो सकती या निष्कामकर्मके बिना मुक्ति नहीं हो सकती अथवा भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती । इसलिये वे अपने मतका मण्डन और दूसरेके मतका खण्डन करते हैं । दूसरेके मतका खण्डन वे बुरी नीयतसे नहीं करतेप्रत्युत इस शुद्ध नीयतसे करते हैं कि लोग विपरीतगामी न होकर अपना कल्याण कर लें । लोगोंके कल्याणके उद्देश्यसे वे अपने मत (मार्ग) का प्रचार करते हैंक्योंकि उस मतका उन्होंने खुद अनुभव किया है और उसमें वे निःसन्देह हुए हैंउनको शान्ति मिली है । अतः उनका वैसा कहना उचित ही है । परन्तु उन दार्शनिकोंके अनुयायियोंमें प्रायः देहाभिमानके कारण अपने मतका आग्रह रहता है । आग्रह रहनेसे वे अपने मतका अनुसरण न करके दूसरे मतका खण्डन करते हैं और दूसरे मतको माननेवालोंसे द्वेष करते हैं । दूसरे मतको माननेसे भी कल्याण हो सकता है‒यह बात उनको जँचती ही नहीं ! उलटे वे दूसरे मतको भ्रम मानते हैं । वे ऐसा मानते हैं कि दूसरोंको हमारे मतमें आना ही पड़ेगातभी उनका कल्याण होगा ! उनका दूसरे मतको माननेवालोंसे जो द्वेष होता हैवह सामान्य सांसारिक राग-द्वेषसे भी मजबूत और भयंकर होता है । उस द्वेषके कारण वे दूसरे मतको सर्वथा मिटा देना चाहते हैं ! इस प्रकार लड़ाई दार्शनिकोंमें नहीं होतीप्रत्युत उनके अनुयायियोंमें होती है ।

अपने साधनके प्रति कृतज्ञतामहत्ताका भाव रहना दोष नहीं हैपर दूसरेके मतका खण्डन करना दोष है । इसलिये साधकको दूसरेके मतका खण्डन तथा अपने मतका आग्रह न करके अपने मतके अनुसार साधन करना चाहिये ।वह दूसरेके मतका खण्डन न करके अधिक-से-अधिक यह कह सकता है कि उस प्रणालीको मैं जानता नहीं ! अपनी अज्ञता कहनेमें दोष नहीं हैप्रत्युत अपना गुण कहनेमें दोष है । कारण कि अपनी अज्ञता (अपूर्णता) कहनेसे दूसरेमें पूर्णता दीखती है और अपना गुण कहनेसे दूसरेमें दोष दीखता है । इसलिये साधकको कभी भी अपनेको सिद्ध नहीं मानना चाहियेप्रत्युत सदा साधक ही मानना चाहिये । अपनेमें सिद्धिपूर्णता माननेसे उसका आगे बढ़ना रुक जायगा और अपने साथ धोखा भी हो जायगा अर्थात् अपनेमें कोई कमी भी होगी तो वह बनी रहेगी ।

प्रश्न‒क्या मुक्त होनेपर भी सूक्ष्म अहम् रहता है ?

उत्तर‒मुक्त होनेपर भी ज्ञानी (दार्शनिक) में सूक्ष्म अहम् रहता हैजिससे दार्शनिकोंमें परस्पर अलगाव,भिन्नताभेद रहता है । यह सूक्ष्म अहम् वास्तवमें अहङ्कारका संस्कार हैजो जन्म-मरणका कारण नहीं होता । गुणोंका संग ही जन्म-मरणका कारण होता है‒‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३ । २१) । मार्गका संग जन्म-मरणका कारण नहीं होता । मार्गका संग है‒जिस मार्गसे सिद्धि (मुक्ति) मिलीउस मार्गका संस्कारजो ‘सूक्ष्म अहम्‌’ कहलाता है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
__________________

* साधन तो अलग-अलग होते हैंपर साधन-तत्त्व एक होता है ।


|
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण नवमी, वि.सं.–२०७१, बुधवार
अलौकिक साधन-भक्ति



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
विवेकमें सत् और असत्‒दो चीज होती हैइसलिये वैराग्य होनेपर भी अन्तःकरणमें असत्‌की अति सूक्ष्म सत्ता रहनेसे उसकी सूक्ष्म वासना रह जाती है । वह वासना प्रेम-भक्तिसे ही दूर होती है‒
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई ।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥
                                                               (मानसउत्तर ४९ । ३)

उस सूक्ष्म वासनाको सर्वथा नष्ट करनेकी ताकत प्रेममें ही है । प्रेममें बिना विचार किये स्वतः असत्‌का आकर्षण मिटता हैक्योंकि सत्-तत्त्वमें प्रेम होनेपर असत्‌की तरफ दृष्टि जाती ही नहींअसत्‌से सर्वथा विमुखता हो जाती है‒‘सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं’ (मानसअरण्य ५ । ६) । तात्पर्य है कि प्रेममें दो चीज नहीं होतीप्रत्युत एक भगवान् ही होते हैं । अतः विवेक तो तटस्थ रहता हैपर प्रेम भगवान्‌में लगाता है । संसारमें जैसे रुपयोंमें आकर्षित करनेकी शक्ति लोभमें ही हैऐसे ही भगवान्‌में आकर्षित करनेकी शक्ति प्रेममें ही है । यह शक्ति विवेकमें नहीं है । हाँ, यदि तीव्र जिज्ञासा हो तो विवेकमें भी सत्-तत्त्वकी मुख्यता हो जाती है । सत्-तत्त्वकी मुख्यता होनेपर वह विवेक केवल वैराग्यका जनक ही नहीं रहताप्रत्युत तत्त्वबोधका प्रापक हो जाता है ।

विवेकमार्गमे सत् और असत्‒दोनोंकी मान्यता साथ-साथ रहनेसे असत्‌की अति सूक्ष्म सत्ता अर्थात् अति सूक्ष्म अहम् दूरतक साथ रहता है । यह सूक्ष्म अहम् मुक्त होनेपर भी रहता है । यह सूक्ष्म अहम् जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होतापर यह परमात्मासे अभिन्न होनेमें बाधक होता है । इसलिये विवेकमार्गमें ज्ञानियोंकी अथवा दार्शनिकोंकी मुक्ति तो हो सकती है, पर परमात्माके साथ अभिन्नता अर्थात् प्रेम नहीं हो सकता । इस सूक्ष्म अहम्‌के कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें परस्पर मतभेद रहता है । विश्वासमार्गमे आरम्भसे ही भक्त एक परमात्माके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानता । इसलिये वह परमात्माके साथ अभिन्न हो जाता है । परमात्माके साथ अभिन्न होनेपर सूक्ष्म अहम् नहीं रहता और उससे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं । इसलिये ज्ञानकी एकतासे प्रेमकी एकता श्रेष्ठ है । कारण कि ज्ञानमें तो भेद रह सकता हैपर प्रेममें कोई भेद रहता ही नहीं ।

विवेकमार्गमें विवेकपूर्वक किया जानेवाला साधन दो प्रकारका होता है‒विध्यात्मक और निषेधात्मक । विध्यात्मक साधनमें सूक्ष्म अहम् बना रहता है । कारण कि इसमें अभ्यासकी मुख्यता रहनेसे असत्‌का आश्रय रहता है । इसमें साधकका यह विचार रहता है कि मुझे सत्‌में स्थिति करनी है । यह विचार रहनेसे असत्‌का संग छूटनेपर भी सत्‌में ‘स्थितिवाला’ रह जाता है‒यही सूक्ष्म अहम् है । यह सूक्ष्म अहंभाव दार्शनिकोंमें एकता नहीं होने देता । दार्शनिकोंमें मतभेद रहनेसे उनके दर्शनोंमें भी मतभेद रहता है अर्थात् वे अपने-अपने मतके अनुसार परमात्माको मानते हैंजो कि समग्रका अंश (आंशिक) होता हैसमग्रनहीं । वे परमात्माके उस समग्र रूपको नहीं जानतेजिसमें कोई मतभेद नहीं है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे


|
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण अष्टमी, वि.सं.–२०७१, मंगलवार
अलौकिक साधन-भक्ति



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
त्यागकी अपेक्षा अर्पण सुगम होता है । कारण किजिस वस्तुमें मनुष्यकी सत्यत्व और महत्त्वबुद्धि होती हैउसको मिथ्या समझकर यों ही त्याग देनेकी अपेक्षा किसी व्यक्तिके अर्पण कर देनाउसकी सेवामें लगा देना सुगम पड़ता है । फिर जो परम श्रद्धास्पदप्रेमास्पद भगवान् हैंउनको अर्पण करनेकी सुगमताका तो कहना ही क्या ! क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुएँ (मात्र संसार) पहलेसे ही भगवान्‌की हैं । उनको भगवान्‌के अर्पण करना केवल अपनी भूल मिटाना है । संसारको भगवान्‌का मानते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । अत: संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये भक्तको विवेककी जरूरत नहीं है । तात्पर्य है कि भक्त संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं करताप्रत्युत उसको भगवान्‌का और भगवत्स्वरूप मानता है ।

विवेक पारमार्थिक विषयमें भी काम करता है और लौकिक विषयमें भी । लौकिक विषयमें विवेकका उपयोग करके मनुष्य बड़ा वैज्ञानिकजजवकील आदि बन सकता हैतरह-तरहके आविष्कार कर सकता हैपर तत्त्वप्राप्ति नहीं कर सकता । कारण कि राग साथमें रहनेसे लौकिक विषयोंका विवेक भोग और संग्रहका महत्त्व बढ़ाकर संसारमें फँसाता हैपापोंमें लगाकर पतन करता है । तात्पर्य है कि संसारकी सत्ता और महत्ता साथमें रहनेसे विवेक बहुत घातकअनर्थका हेतु होता है । वास्तवमें लौकिक विषयोंका विवेक ‘अविवेक’ ही है । पारमार्थिक विषयका विवेक अर्थात् सत्-असत्‌का विवेक ही वास्तविक विवेक है* । सत्-असत्‌का विवेक होनेसे पारमार्थिक अथवा लौकिक दोनों कार्य ठीक होते हैंक्योंकि विवेकी मनुष्यकी बुद्धि हरेक विषयमें प्रविष्ट होती है ।

पारमार्थिक विवेकवाला मनुष्य लौकिक विषयोंका भी ठीक ढंगसे उपयोग कर सकता है । परन्तु केवल लौकिक विवेकवाला मनुष्य लौकिक विषयोंका भी ठीक ढंगसे उपयोग नहीं कर पाता‒
उपभोक्तुं न शक्नोति   श्रियं  प्राप्यापि मानवः ।
आकण्ठजलमग्नोऽपि श्वा लेढीति स्वजिह्वया ॥

 ‘प्रारब्धवश धन-सम्पत्ति प्राप्त करके भी अविवेकी मनुष्य उसका ठीक ढंगसे उपभोग नहीं कर सकताजैसे‒गलेतक जलमें डूबे होनेपर भी कुत्ता जीभसे ही जलको चाटता है (उसको सीधे जल पीना आता ही नहीं) ।’

वास्तविक विवेक वैराग्यका जनक है । यदि वैराग्य न हो तो विवेक वास्तविक (असली) नहीं है । ‘मेरा असत्‌के साथ सम्बन्ध है ही नहीं’इस विवेकसे वैराग्य होता ही है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
_________________

                                    * प्रवृत्तिं  च   निवृत्तिं   च    कार्याकार्ये   भयाभये ।
        बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
                                                                                                   (गीता १८ । ३०)
                 ‘हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिकोकर्तव्य और अकर्तव्यकोभय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती हैवह बुद्धि सात्त्विकी है ।’


|
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण सप्तमी, वि.सं.–२०७१, सोमवार
अलौकिक साधन-भक्ति



संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माको प्राप्त करनेके तीन मुख्य साधन हैं‒कर्मयोगज्ञानयोग और भक्तियोग । भागवतमें भगवान् कहते हैं‒
योगास्त्रयो  मया  प्रोक्ता   नृणां  श्रेयोविधित्सया ।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥
                                                                       (श्रीमद्भा ११ । २० । ६)
‘अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योगमार्ग (भगवद्गीतामें) कहे हैं‒ज्ञानयोगकर्मयोग और भक्तियोग* । इन तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है ।’

कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी मुख्यता है और भक्तियोगमें भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़नेकी मुख्यता है । इसलिये कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘लौकिक साधन’ हैं और भक्तियोग ‘अलौकिक साधन’ है । लौकिक साधन ‘विवेकमार्ग’ है और अलौकिक साधन‘विश्वासमार्ग’ है । विवेकमार्गमें विवेककी मुख्यता और श्रद्धा-विश्वासकी गौणता है तथा विश्वासमार्गमे श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता और विवेककी गौणता है । संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें विवेक काम आता है और भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़नेमें विश्वास काम आता है । साधकसे प्रायः यह भूल होती है कि वह विवेकमें विश्वास और विश्वासमें विवेक मिलाता है अर्थात् विवेकमार्गमे विश्वासकी मुख्यता और विश्वासमार्गमें विवेककी मुख्यता करता है । इस कारण उसका साधन जल्दी सिद्ध नहीं होता । संसारसे मेरा सम्बन्ध है कि नहीं है‒इसमें विश्वास नहीं करना हैप्रत्युत विवेक करना है । भगवान् हैं कि नहीं हैं और मेरे हैं कि नहीं हैं‒इसमें विवेक नहीं करना है,प्रत्युत विश्वास करना है । कारण कि जगत् तथा जीव विचारके विषय हैं और भगवान् केवल विश्वास (मान्यता) के विषय हैं । विवेक (विचार) वहीं लगता हैजहाँ सन्देह होता है और सन्देह अल्प ज्ञानमें अथवा अधूरे ज्ञानमें होता है । तात्पर्य है कि जिसके विषयमें हमारा आंशिक ज्ञान है अर्थात् कुछ जानते हैंकुछ नहीं जानतेवहीं विवेक चलता है । परन्तु जिसके विषयमें कुछ नहीं जानतेवहाँ विश्वास ही चलता है । विश्वासमें सन्देह नहीं होता । विश्वास करने अथवा न करनेमें सब स्वतन्त्र हैं* 

ज्ञानी संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करता है और भक्त एक भगवान्‌के सिवाय अन्य किसीसे अपना सम्बन्ध मानता ही नहीं । दूसरे शब्दोंमें ज्ञानी ‘मैं’ व ‘मेरा’का त्याग करता है और भक्त ‘तू’ व ‘तेरा’ को स्वीकार करता है । इसलिये ज्ञानी पदार्थ व क्रियाका त्याग करता है और भक्त पदार्थ व क्रियाको भगवान्‌के अर्पण करता है (गीता १ । २६-२७) अर्थात् उनको अपना न मानकर भगवान्‌का और भगवत्स्वरूप मानता है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
________________

          * गीतामें भगवान्‌ने ज्ञानयोगकर्मयोग और भक्तियोग‒इसी क्रमसे उपदेश दिया है ।

         वेदपुराण आदि ग्रन्थोंसेभगवान्‌के भक्तोंसे अथवा कोई दुःख आनेसे भगवान्‌पर विश्वास हो जाता है । जब कोई आफत आती है और उससे बचनेका कोई उपाय नहीं दीखताकोई सहारा नहीं दीखता तथा उससे बचनेके लिये किये गये सब प्रयत्न फेल हो जाते हैंतब मनुष्यको भगवान्‌पर विश्वास करना ही पड़ता है ! भगवान्‌को पुकारना ही पड़ता है !


|
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण पंचमी, वि.सं.–२०७१, रविवार
भगवान्‌का अलौकिक समग्ररूप



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
वास्तवमें लौकिक-अलौकिकका विभाग राग-द्वेषके कारण ही है । राग-द्वेष न हो तो सब कुछ अलौकिक (चिन्मय) ही है‒‘वासुदेवः सर्वम्’ । कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है । राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है । राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्सरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया ! इसलिये भगवान्‌ने राग-द्वेषको साधकका महान् शत्रु बताया‒
इन्द्रियस्येन्द्रिस्यार्थे  रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
                                                                             (गीता ३ । ३४)
‘इन्द्रिय इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं । मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहियेक्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्र डालनेवाले) शत्रु हैं ।’
काम  एव  क्रोध     एष    रजोगुणसमुद्धवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
                                                                              (गीता ३ । ३७)
‘रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है । यह बहुत खानेवाला और महापापी है । इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान ।’

‘क्षर’ (नाशवान्) की मुख्यता माननेसे जीव असुर बन जाता है‘अक्षर’ (अविनाशी) की मुख्यता माननेसे जीव ज्ञानी बन जाता है और ‘पुरुषोत्तम’ (समग्र-भगवान्) की मुख्यता माननेसे जीव प्रेमी बन जाता है । प्रेमी बननेसे भक्त और भगवान्‌के बीच प्रेमका आदान-प्रदान होता है । जैसे बच्चेकी चेष्टा माँको और माँकी चेष्टा बच्चेको प्रसन्न करनेवाली होती हैऐसे ही भक्तकी चेष्टा भगवान्‌को और भगवान्‌की चेष्टा भक्तको प्रसन्न करनेवालीआनन्द देनेवालीप्रेमरसकी वृद्धि करनेवाली होती है । प्रेमी और प्रेमास्पदकी इस अभिन्नताको गोस्वामीजी महाराजने बड़े सुन्दर ढंगसे कहा है‒
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न ।
                                                                                 (मानसबाल १८)
अर्थात् जो वाणी तथा उसके अर्थ और जल तथा उसकी लहरके समान कहनेमें ही अलग-अलग दीखते हैंपर वास्तवमें एक ही हैं । यहाँ गोस्वामीजीने पहले स्त्रीवाचक ‘गिरा’ शब्द देकर फिर पुरुषवाचक ‘अरथ’ शब्द दिया है और उसके बाद पहले पुरुषवाचक ‘जल’ शब्द देकर फिर स्त्रीवाचक ‘बीचि’ शब्द दिया है । इससे यह तात्पर्य निकलता है कि स्त्रीवाचक ‘सीता’ और पुरुषवाचक ‘राम’दोनों अभिन्न हैं । अत: चाहे ‘सीता’ पहले कहो (सीताराम कहो),चाहे ‘राम’ पहले कहो (रामसीता कहो)‒दोनोंमें कोई फर्क नहीं है* । प्रेममें कोई भेद नहीं रहता । प्रेममें भक्त और भगवान्‒दोनों समान हैं‒
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ।
                                                                   (नारदभक्ति ४१)
‘भगवान्‌में और उनके भक्तमें भेदका अभाव है ।’

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
___________________
* भरतजी प्रेम-विभोर होकर ‘रामसिय-रामसिय’ नामका उच्चारण करते हैं‒
    भरत तीसरे  पहर  कहँ     कीन्ह   प्रबेसु   प्रयाग ।
    कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥
                                                                                          (मानसअयोध्या २०३)


|
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.–२०७१, शनिवार
भगवान्‌का अलौकिक समग्ररूप



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने कहा है‒
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ।
                                                                             (मानसबाल ६)
तात्पर्य है कि जड और चेतन‒दोनों ब्रह्माजीकी सृष्टिमें होनेसे लौकिक हैं । गीतामें भी भगवान्‌ने कहा है‒
द्वाविमौ पुरुषौ लोके    क्षरश्राक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
                                                                          (गीता १५ । १६)
‘इस लोकमें क्षर और अक्षर‒ये दो प्रकारके पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर क्षर (नाशवान्) हैं और कूटस्थ जीवात्मा अक्षर (अविनाशी) कहा गया है ।’

इस दृष्टिसे क्षर और अक्षरशरीर और शरीरीदेह और देहीक्षेत्र और क्षेत्रज्ञ‒ये सभी लौकिक हैं ।

दैवी सम्पत्ति मुक्त करनेवाली और आसुरी सम्पत्ति बाँधनेवाली है‒-‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरीमता’(गीता १६ । ५) । दैवी और आसुरी‒दोनों ही सम्पत्तिवाले प्राणी लौकिक हैं‒‘द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च’(गीता १६ । ६) । इसलिये मोक्ष और बन्धन भी लौकिक हैं ।
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न  मुमुक्षुर्न  वै  मुक्त    इत्येषा   परमार्थता ॥
              (आत्मोपनिषद् ३१माण्डूक्यकारिका २ । ३२,तत्वोपदेश ८१विवेकचूडामणि ५७५)

 ‘न प्रलय है और न उत्पत्ति हैन बद्ध है और न साधक हैन मुमुक्षु है और न मुक्त है‒यही परमार्थता अर्थात् वास्तविक तत्त्व है ।’

तात्पर्य है कि बन्धन और मोक्ष‒दोनों ही सापेक्ष होनेसे लौकिक हैं । निरपेक्ष तत्त्वमें न बन्धन है और न मोक्ष है । अत: वास्तविक तत्त्व अलौकिक है । इसलिये प्रेमी भक्त कहता है‒

अब तो बंध मोक्षकी इच्छा  व्याकुल कभी न करती है ।
मुखड़ा ही नित नव बन्धन है, मुक्ति चरणसे झरती है ॥

चेतन और जड, जीव और जगत् विचारके विषय हैं;अत: ‘ज्ञान’ लौकिक है । परन्तु भगवान् विचारके विषय नहीं हैंप्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय है*अत: ‘भक्ति’ अलौकिक है । ज्ञानमार्गमें जबतक विवेक रहता हैतबतक लौकिकता रहती है । जब विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता हैतब ज्ञानीमें भी अलौकिकता आ जाती है । कारण कि ज्ञान (तत्त्वज्ञान) अज्ञानका नाशक है । अज्ञानका नाश करके ज्ञान भी शान्त हो जाता है और ज्ञानीमें अलौकिकता आ जाती है । इसलिये जैसे भक्तिमार्गमें मीराबाईका शरीर चिन्मय होकर लीन हो गया थाऐसे ही ज्ञानमार्गमें भी कबीर साहेबका शरीर चिन्मय होकर लीन हो गया था ।

अवतारके समय लौकिक दृष्टिसे दीखनेपर भी भगवान् सदा अलौकिक ही रहते हैं । लोकमें अवतार लेनेपर भी उनकी अलौकिकता ज्यों-की-त्यों रहती है । भगवान् कहते हैं‒
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय     सम्भवाम्यात्ममायया ॥
                                                                                (गीता ४ । ६)
भगवान् ही जगत्-रूपसे प्रकट हुए हैंइसलिये यह जगत् भगवान्‌का आदि अवतार कहा जाता है‒‘आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य’ ( श्रीमद्भा २ । ६ । ४१) । जैसे भगवान्‌ने रामकृष्ण आदि रूपोंसे अवतार लिया हैऐसे ही जगत्-रूपसे भी अवतार लिया है । इसको अवतार इसलिये कहते हैं कि इसमें भगवान् दृश्यरूपसे दीखनेमें आ जाते हैं । अवतारके समय भगवान् अलौकिक होते हुए भी राग-द्वेषके कारण अज्ञानियोंको लौकिक दीखते हैं‒
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामयुद्धयः ।
                                                                             (गीता ७ । २४)

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
                                                                               (गीता ७ । २५)

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
                                                                    (गीता ९ । ११)

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे

______________________
         * भगवान् श्रद्धा-विश्वासके विषय हैंइसलिये आस्तिक और नास्तिक‒दोनों तरहके दर्शन हैं । न्यायदर्शन और वैशेषिकदर्शन लौकिक हैं । योगदर्शन और सांख्यदर्शन लौकिक तथा अलौकिक दोनों हैं । पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा केवल अलौकिक हैं ।

|