।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण द्वादशीवि.सं.२०७१बुधवार
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलग-अलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता हैऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलग-अलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है । धर्मके अनुष्ठानमें शरीरधन आदि वस्तुओंकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है ।

एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है । दोनों विभाग अलग-अलग हैं । करनेकी चीज है‒कर्तव्य और होनेकी चीज है‒फल । मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है फलमें नहीं‒‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २ । ४७) । तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती हैउसके लिये ‘यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये’ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोक-मर्यादाके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना चाहिये । ‘करना’ पुरुषार्थके अधीन है और ‘होना’ प्रारब्धके अधीन है । इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है । मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है‒‘करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे ।’

क्रियमाणसंचित और प्रारब्ध‒तीनों कर्मोसे मुक्त होनेका क्या उपाय है ?

प्रकृति और पुरुष‒ये दो हैं । प्रकृति सदा क्रियाशील हैपर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती । प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला ‘प्रकृतिस्थ’ पुरुष ही कर्ता-भोक्ता बनता है । जब वह प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता हैतब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता ।

प्रारब्ध-सम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं‒

(१) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है‒यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है । कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है । प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं हैप्रत्युत अज्ञानका काम है । अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखी-दुःखी नहीं होता । उसे केवल अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होता है । ज्ञान होना दोषी नहीं हैप्रत्युत सुख-दुःखरूप विकार होना दोषी है । इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता ।

(२) जैसा प्रारब्ध होता हैवैसी बुद्धि बन जाती है । जैसेएक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्री कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है । बादमें जब बाजारभाव तेज हो जाता हैतब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है और जब बाजार-भाव मन्दा हो जाता हैतब बिक्री करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है । अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता हैउसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है,जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके । परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय‒इसमें मनुष्य स्वतन्त्र हैक्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) हैप्रारब्ध नहीं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण एकादशीवि.सं.२०७१मंगलवार
कामदा एकादशी-व्रत (सबका)
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगाप्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा । यहाँ दण्ड मिले या न मिलेपर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा । उससे वह बच नहीं सकेगा । अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा । वह धन बीमारीमेंचोरीमेंडाकेमें,मुकदमेमेंठगाईमें चला जायगा । तात्पर्य यह कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला हैउतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा । इतना ही नहींइन्कम-टैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैंवे संस्कार जन्म-जन्मान्तरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा ।

अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगाआदि-आदि । इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला हैवह किसी-न-किसी कारणसे मिलेगा ही* 

परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहींकम-से-कम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे । इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती हैजिससे हृदयमें जलन रहती है,दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता हैपकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता हैआदि-आदि । अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्तिआनन्दप्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध हैउतनी जीवन-निर्वाहकी सामग्री भी किसी-न-किसी तरह मिलती ही रहती है ।

जैसे व्यापारमें घाटा लगनाघरमें किसीकी मृत्यु होनाबिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता पर फिर भी वह आती ही हैऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है,उसको कोई रोक नहीं सकता । भागवतमें आया है‒
सुखमैन्द्रियकं  राजन्     स्वर्गे  नरक  एव  च ।
देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः ॥
                                          (श्रीमद्भा ११ । ८ । १)

‘राजन् ! प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैंऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं । अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे ।’

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे

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* प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो      दैवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः ।
   तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥
                                                                 (पञ्चतन्त्र मित्रसम्प्राप्ति ११२)

             ‘प्राप्त होनेवाला धन मनुष्यको मिलता ही हैदैव भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता । इसलिये न तो मैं शोक करता हूँ और न मुझे विस्मय ही होता हैक्योंकि जो हमारा है वह दूसरोंका नहीं हो सकता ।’


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण दशमीवि.सं.२०७१सोमवार
श्रावण सोमवार-व्रत, एकादशी-व्रत कल है
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 इसलिये शुभ और अशुभ कर्मोंमें एक कायदाकानून नहीं है । अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्‌के अर्पण करनेसे ऋण और पाप-कर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँपरन्तु ऐसा सम्भव नहीं है । हाँइसमें एक मार्मिक बात है कि अपने-आपको सर्वथा भगवान्‌के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्‌के शरण हो जानेपर पाप-पुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं* (गीता १८ । ६६) ।

दूसरी शंका यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है‒ऐसी बात समझमें नहीं आतीक्योंकि हम देखते हैं कि इन्कम-टैक्ससेल्स-टैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आना-जाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ यह तो चोरीके ही अधीन हुआ !

इसका समाधान इस प्रकार है । वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना‒इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है । परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध होता हैभोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है,धन-प्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है । जिसका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध तो है पर भोगका प्रारब्ध नहीं हैउसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्यडॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकताउसको खानेमें रूखा-सूखा ही मिलता है । जिसका भोगका प्रारब्ध तो है पर धनका प्रारब्ध नहीं है,उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुख-आराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती । उसको किसीकी दयासे,मित्रतासेकाम-धंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवन-निर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे

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* देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां न किङ्करो नायमृणी च राजन् ।
    सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं    गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ॥
                                                      (श्रीमद्धा ११ । ५ । ४१)

‘राजन् ! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान्‌की शरणमें आ जाता हैवह देवऋषि,कुटुम्बीजन और पितृगण‒इन किसीका भी ऋणी और सेवक नहीं रहता ।’

 सर्वथा त्यागीको भी अनुकूल वस्तुएँ बहुत मिलती हुई देखी जाती हैं (यह बात अलग है कि वह उन्हें स्वीकार न करे) । त्यागमें तो एक और विलक्षणता भी है कि जो मनुष्य धनका त्याग कर देता है,जिसके मनमें धनका महत्त्व नहीं है और अपनेको धनके अधीन नहीं मानताउसके लिये धनका एक नया प्रारब्ध बन जाता है । कारण कित्याग भी एक बड़ा भारी पुण्य हैजिससे तत्काल एक नया प्रारब्ध बनता है ।

धान नहीं धीणों नहीं    नहीं रुपैयो रोक ।
जिमण बैठे रामदासआन मिलै सब थोक ॥


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण नवमीवि.सं.२०७१रविवार
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 एक राजा अपनी प्रजा-सहित हरिद्वार गया । उसके साथमें सब तरहके लोग थे । उनमें एक चमार भी था । उस चमारने सोचा कि ये बनिये लोग बड़े चतुर होते हैं । ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं । अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायँ ! ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा । जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दान-पुण्यका संकल्प कराने लगातब उस बनियेने कहा‒‘मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार दिये थेआज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ !’ पण्डेने संकल्प भरवा दिया । चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दियाकितना बुद्धिमान् है ! मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा । जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू कियातब चमारने कहा‒‘अमुक बनियेने मुझे सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ ।’ उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया । इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दान-पुण्य कर दिया !

सब घर पहुँचे । समयपर खेती हुई । ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ । ब्राह्मण-देवताने बनियेसे कहा‒‘सेठ ! आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लोइससे आपको नफा भी हो सकता है । मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है ।’ बनियेने कहा‒‘ब्राह्मण देवता ! जब मैं हरिद्वार गया थातब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये ।’ ब्राह्मण बोला‒‘सेठ ! मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैंदान नहीं लिये । इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहताव्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ ।’ सेठने कहा‒‘आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं । मैंने सौ रुपये भगवान्‌के अर्पण कर दिये हैंइसलिये मैं तो लूँगा नहीं ।’ अब ब्राह्मण और क्या करता ?वह अपने घर लौट गया । अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थेवह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला‒‘लाओ मेरे रुपये । तुम्हारा अनाज हुआ है सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो ।’ चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये । अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला‒‘मैंने तो अमुक सेठकी तरह गंगाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे ?’ बनिया बोला‒‘तेरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकताक्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोडनेसे कैसे छूट जायगा मैं तो अपने सौ रुपये व्याजसहित पूरे लूँगालाओ मेरे रुपये !’ ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया ।

इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा हैवह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता । ऐसे हीहम भगवदाज्ञानुसार शुभ कर्मोंको तो भगवान्‌के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैंपर अशुभ कर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण अष्टमीवि.सं.२०७१शनिवार
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 संसारमें एक आदमी पुण्यात्मा हैसदाचारी है और दुःख पा रहा है तथा एक आदमी पापात्मा हैदुराचारी है और सुख भोग रहा है‒इस बातको लेकर अच्छे-अच्छे पुरुषोंके भीतर भी यह शंका हो जाया करती है कि इसमें ईश्वरका न्याय कहाँ है ?* इसका समाधान यह है कि अभी पुण्यात्मा जो दुःख पा रहा हैयह पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पापका फल हैअभी किये हुए पुण्यका नहीं । ऐसे ही अभी पापात्मा जो सुख भोग रहा हैयह भी पूर्वके किसी जन्ममें किये हुए पुण्यका फल है अभी किये हुए पापका नहीं ।

इसमें एक तात्त्विक बात और है । कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती हैउससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती हैउससे दुःख ही होता है‒ऐसी बात है नहीं । जैसेअनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता हैछोटोंसे घृणा होती हैअपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती हैअसहिष्णुता होती हैअन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वक्तपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है । इस तरह सुख-सामग्री और धन-सम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता । परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है । ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोग-सामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धन-सम्पत्ति आदि सामग्री नहीं हैबेचारा बड़ा दुःखी है ! परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है । वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती । इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है । सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है ।

पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है । पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्‌के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता हैपरन्तु पाप भगवान्‌के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता । पापका फल तो भोगना ही पड़ता हैक्योंकि भगवान्‌की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्‌के अर्पण कैसे हो सकते हैं और अर्पण करनेवाला भी भगवान्‌के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण क्सैए कर सकता है प्रत्युत भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्‌के अर्पण होते हैं । इस विषयमें एक कहानी आती है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे

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          * महाभारतवनपर्वमें एक कथा आती है । एक दिन द्रौपदीने युधिष्ठिरजी महाराजसे कहा कि आप धर्मको छोड़कर एक कदम भी आगे नहीं रखतेपर आप वनवासमें दुःख पा रहे हैं और दुर्योधन धर्मकी किंचिन्मात्र भी परवाह न करके केवल स्वार्थ-परायण हो रहा हैपर वह राज्य कर रहा हैआरामसे रह रहा है और सुख भोग रहा है  ऐसी शंका करनेपर युधिष्ठिरजी महाराजने कहा कि जो सुख पानेकी इच्छासे धर्मका पालन करते हैंवे धर्मके तत्त्वको जानते ही नहीं ! वे तो पशुओंकी तरह सुख-भोगके लिये लोलुप और दुःखसे भयभीत रहते हैंफिर बेचारे धर्मके तत्त्वको कैसे जानें ! इसलिये मनुष्यकी मनुष्यता इसीमें है कि वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिकी परवाह न करके शास्त्रके आज्ञानुसार केवल अपने धर्म- (कर्तव्य- )का पालन करते रहें ।


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
श्रावण कृष्ण सप्तमीवि.सं.२०७१शुक्रवार
कर्म-रहस्य



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
 प्रारब्ध-कर्मोंके फलस्वरूप जो अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति आती हैउन दोनोंमें अनुकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें तो मनुष्य स्वतन्त्र हैपर प्रतिकूल परिस्थितिका स्वरूपसे त्याग करनेमें मनुष्य परतन्त्र है अर्थात् उसका स्वरूपसे त्याग नहीं किया जा सकता । कारण यह है कि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंका हित करनेउन्हें सुख देनेके फलस्वरूप बनी है और प्रतिकूल परिस्थिति दूसरोंको दुःख देनेके फलस्वरूप बनी है । इसको एक दृष्टान्तसे इस प्रकार समझ सकते हैं‒

श्यामलालने रामलालको सौ रुपये उधार दिये । रामलालने वायदा किया कि अमुक महीने मैं व्याजसहित रुपये लौटा दूँगा । महीना बीत गया पर रामलालने रुपये नहीं लौटाये तो श्यामलाल रामलालके घर पहुँचा और बोला‒‘तुमने वायदेके अनुसार रुपये नहीं दिये ! अब दो ।’ रामलालने कहा‒‘अभी मेरे पास रुपये नहीं हैंपरसों दे दूँगा ।’ श्यामलाल तीसरे दिन पहुँचा और बोला‒‘लाओ मेरे रुपये !’ रामलालने कहा‒‘अभी मैं आपके पैसे नहीं जुटा सका,परसों आपके रुपये जरूर दूँगा ।’ तीसरे दिन फिर श्यामलाल पहुँचा और बोला‒‘रुपये दो !’ तो रामलालने कहा‒‘कल जरूर दूँगा ।’ दूसरे दिन श्यामलाल फिर पहुँचा और बोला‒‘लाओ मेरे रुपये !’ रामलालने कहा‒‘रुपये जुटे नहीं,मेरे पास रुपये हैं नहीं तो मैं कहाँसे दूँ परसों आना ।’ रामलालकी बातें सुनकर श्यामलालको गुस्सा आ गया और ‘परसों-परसों करता हैरुपये देता नहीं’ऐसा कहकर उसने रामलालको पाँच जूते मार दिये । रामलालने कोर्टमें नालिश (शिकायत) कर दी । श्यामलालको बुलाया गया और पूछा गया‒‘तुमने इसके घरपर जाकर जूता मारा है ?’ तो श्यामलालने कहा‒‘हाँ साहबमैंने जूता मारा है ।’ मैजिस्ट्रेटने पूछा‒‘क्यों मारा ?

श्यामलालने कहा‒‘इसको मैंने रुपये दिये थे और इसने वायदा किया था कि मैं इस महीने रुपये लौटा दूँगा । महीना बीत जानेपर मैंने इसके घरपर जाकर रुपये माँगे तो कल-परसोंकल-परसों कहकर इसने मुझे बहुत तंग किया । इसपर मैंने गुस्सेमें आकर इसे पाँच जूते मार दिये तो सरकार ! पाँच जूतोंके पाँच रुपये काटकर शेष रुपये मुझे दिला दीजिये ।’

मैजिस्ट्रेटने हँसकर कहा‒‘यह फौजदारी कोर्ट है । यहाँ रुपये दिलानेका कायदा (नियम) नहीं है । यहाँ दण्ड देनेका कायदा है । इसलिये आपको जूता मारनेके बदलेमें कैद या जुर्माना भोगना ही पड़ेगा । आपको रुपये लेने हों तो दीवानी कोर्टमें जाकर नालिश करोवहाँ रुपये दिलानेका कायदा है;क्योंकि वह विभाग अलग है ।’

इस तरह अशुभ कर्मोंका फल जो प्रतिकूल परिस्थिति हैवह ‘फौजदारी’ हैइसलिये उसका स्वरूपसे त्याग नहीं कर सकते और शुभ कर्मोंका फल जो अनुकूल परिस्थिति है,वह ‘दीवानी’ हैइसलिये उसका स्वरूपसे त्याग किया जा सकता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि मनुष्यके शुभ-अशुभ कर्मोंका विभाग अलग-अलग है । इसलिये शुभ कर्मों (पुण्यों) और अशुभ कर्मों- (पापों- ) का अलग-अलग संग्रह होता है । स्वाभाविकरूपसे ये दोनों एक-दूसरेसे कटते नहीं अर्थात् पापोंसे पुण्य नहीं कटते और पुण्योंसे पाप नहीं कटते । हाँ, अगर मनुष्य पाप काटनेके उद्देश्यसे (प्रायश्चित्तरूपसे) शुभ कर्म करता है तो उसके पाप कट सकते हैं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘कर्म-रहस्य’ पुस्तकसे