।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी, वि.सं.२०७२, शुक्रवार
हलषष्ठी (ललहीछठ)
प्रवचन‒८


हम यह तो कहते है कि मन मेरा है, बुद्धि मेरी है, इन्द्रियाँ मेरी है, प्राण मेरे हैं; पर यह नहीं कहते कि मैं मन हूँ, मैं बुद्धि हूँ, मैं इन्द्रियाँ हूँ, मैं प्राण हूँ । इससे यह सिद्ध हुआ किमैं’-पन ‘मेरा’पनसे अलग है अर्थात् मेरे कहलानेवाले पदार्थोंसे मैं अलग हूँ । विचार करें तो मेरे कहलानेवाले पदार्थ भी वास्तवमें मेरे नहीं है, अपितु प्रकृतिके है । स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरके साथ तादात्म्य करनेके कारण ही ये मेरे प्रतीत होते हैं ।

अपना स्वरूप स्थूल, सूक्ष्म और कारण‒तीनों ही शरीरोंसे अलग है । अतः स्वरूपमें इन शरीरोंकी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति‒तीनों ही अवस्थाएँ नहीं हैं । अवस्थाएँ बदलती है और स्वरूप नहीं बदलता । स्वरूप इन अवस्थाओंको जाननेवाला है; अतः इनसे अलग है । यदि इन अवस्थाओंको जाननेवाला अवस्थाओंसे अलग न होता तो इन तीनों अवस्थाओंकी गणना कौन करता ? और इनके बदलनेको कौन देखता ? अवस्थाएँ तीन है और ये बदलती है‒इसमें किसीको भी संदेह नहीं । तात्पर्य यह निकला कि अपना स्वरूप अवस्थाओंसे अलग है ।

हम सबका यह अनुभव है कि अवस्थाएँ हमारे बिना नहीं रह सकतीं, पर हम अवस्थाओंके बिना रह सकते है और रहते भी हैं । जब जाग्रत्से स्वप्न-अवस्थामें जाते है, तब उस (जाग्रत् और स्वप्नकी) सन्धिमें कोई अवस्था नहीं होती । इसी प्रकार स्वप्नसे सुषुप्ति-अवस्थामें जाते है, तब उस सन्धिमें कोई अवस्था नहीं होती । परंतु उनकी सन्धिमें कोई अवस्था न होनेपर भी हम रहते हैं । स्वप्न-अवस्था चली गयी और जाग्रत्-अवस्था आ गयी, सुषुप्ति-अवस्था चली गयी और जाग्रत्-अवस्था आ गयी‒इस प्रकार अवस्थाओंके बदलनेको हम जानते हैं । इससे सिद्ध हुआ कि हम अवस्थाओंसे अतीत हैं ।

मैंशब्दके दो अर्थ है‒एक सत्तारूप वास्तविक ‘मैं’ और दूसरा माना हुआ मैंवास्तविकमैंसदा ज्यों-का-त्यों रहता है पर माना हुआमैंकिसी भी समय एक नहीं रहता, अपितु बदलता रहता है; जैसे‒मैं जागता हूँ, मैं सोता हूँ, मैं धनी हूँ, मैं निर्धन हूँ, मैं विद्वान् हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं साधु हूँ, मैं गृहस्थ हूँ इत्यादि । यह माना हुआ ‘मैं’ परस्पर विरुद्ध मान्यता भी करता है; जैसे‒पिताके सामने मैंपुत्र हूँ और पुत्रके सामने ‘मैं’ पिता हूँ । अतः यह माना हुआ मैंहमारा वास्तविक स्वरूप नहीं है । इस मैंको पकड़नेसे ही हम परिच्छिन्न होते है; क्योंकि जिसके साथ हम मैंमानते है, वह परिच्छिन्न (एकदेशीय) है । अपनी वास्तविक सत्तामें परिच्छिन्नता नहीं है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण पंचमी, वि.सं.२०७२, गुरुवार
श्रीचन्द्रषष्ठी
विचार करें


(गत ब्लॉगसे आगेका)
सब लोग अपने मतलबसे प्रेम करते हैं । बिना मतलब प्रेम करनेवाले भगवान् और उनके भक्त ही हैं । अगर वे हमें अच्छे लगने लग जायँ तो हम सन्त बन जायँगे, ऊँचे बन जायँगे । परन्तु झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, धोखेबाजी अच्छी लगेगी तो नीचे बन जायँगे । अपनी तरफ देखें कि क्या दशा है ? सत्संग कितने वर्षोंसे कर रहे हैं और भगवान्के नजदीक कितने गये हैं ? विचार करें । रुपये कितने प्यारे लगते हैं, पर चट हाथसे निकल जाते हैं । फिर भी हाय रुपया, हाय रुपया करते हो ! रुपया आपको याद नहीं करता । पर भगवान् आपको याद करते हैं, आपकी रक्षा करते हैं, सहायता करते हैं । भगवान्‌के समान दूसरा कौन है ?

उमा राम सम हित जग माहीं ।
गुरु पितु मातु  बंधु प्रभु नाहीं ॥
                               (मानस, किष्किंधा १२ । १)

भगवान्ने हमारा कितना उपकार किया है, कितना उपकार करते हैं और कितना उपकार करेंगे ! भगवान्के समान हित करनेवाला कोई है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं । हम भगवान्के लिये क्या करते हैं ? भगवान्को हमारेसे क्या स्वार्थ है ? फिर भी वे हमसे प्रेम रखते हैं, हमारा हित करते हैं । अगर हम सच्चे हृदयसे भगवान्में लग जायँ तो निहाल हो जायँगे ।

नाम नाम बिनु ना रहे,    सुनो सयाने लोय ।
मीरा सुत जायो नहीं, शिष्य न मुंड्यो कोय ॥

हम सोचते हैं कि हमारा बेटा हो जाय तो हम निहाल हो जायँगे, हमारा चेला बन जाय तो हम निहाल हो जायँगे । परन्तु मीराबाईका न कोई बेटा हुआ, न उन्होंने कोई चेला बनाया, पर आज कई पीढ़ी बीतनेपर भी लोग उनका नाम लेते हैं, उनको याद करते हैं । आपको तीन-चार पीढ़ीके नाम भी याद नहीं होंगे ! मीराबाईमें एक ही विशेषता थी‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई ।’ एक भगवान्‌को याद करनेसे सब काम ठीक हो जाता है । लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं । परन्तु भोगोंको याद करनेसे शरीर भी खराब होता है, मन भी खराब होता है, आदत भी खराब होती है, स्वास्थ्य भी खराब होता है । इसलिये हरदम भगवान्को याद रखो । यही सबका सार है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.२०७२, बुधवार
विचार करें


(गत ब्लॉगसे आगेका)
संसारमें ऐसा कोई है, जो केवल याद करनेसे राजी हो जाय ? आप दिनभर काम करके शामको घर जाओ और स्त्रीसे पूछो कि रसोई बनायी ? वह कहे कि नहीं, मैं तो आपको याद कर रही थी तो क्या आप राजी हो जाओगे ? रोटी तो बनायी ही नहीं, याद करनेसे क्या होगा ? परन्तु भगवान्को याद करनेसे ही वे राजी हो जायँगे । क्या इतना सस्ता कोई है ? इतना हितैषी कोई है ? उसको तो भूल जाते हैं और संसारको याद रखते हैं ! क्या यह उचित है ? भगवान्का स्मरण करके कितने बड़े-बड़े सन्त-महात्मा हो गये ! आज उनका सब आदर करते हैं । उनमें यह विशेषता इसलिये आयी कि उन्होंने संसारको याद न करके भगवान्को याद किया ।

विचार करें, हम सन्त-महात्माओंका कहना मानते हैं कि संसारमें रचे-पचे लोगोंका कहना मानते हैं ? जो सदा हमारा हित चाहते हैं और हित करते हैं, जिन्होंने हमारा कभी अहित नहीं किया, कभी धोखा नहीं दियावे तो हमें अच्छे नहीं लगते और धोखा देनेवाले, ठगाई करनेवाले आदमी अच्छे लगते हैं, फिर हमारा भला कैसे होगा ? उद्धार कैसे होगा ? हरदम भगवान्को याद करो और ‘हे नाथ ! हे नाथ !!’ पुकारते रहो तो आपकी विलक्षण स्थिति हो जायगी । लोग आपको महात्मा कहेंगे । सच्चाईसे, ईमानदारीसे काम करो तो लोग अच्छा कहेंगे । पहले भले ही बुरा कह दें, पर अन्तमें सब अच्छा-ही-अच्छा कहेंगे ।

भगवान् सदा हित करनेवाले हैं । उनके द्वारा कभी किसीका अहित नहीं होता, सदा हित-ही-हित होता है । हम उनकी परवाह नहीं करते, उनको याद नहीं करते, इतनेपर भी वे हमारा हित करना छोड़ते नहीं । वे भगवान् हमें मीठे लगने चाहिये । उनकी मीठी-मीठी याद आनी चाहिये । उनको याद करके हम पवित्र हो जायँगे, सन्त हो जायँगे ! जिनको हम याद करते हैं, वे स्त्री, पुत्र, परिवार हमें क्या निहाल करेंगे ? मीराबाईने भगवान्को अपना मान लिया तो अच्छे -अच्छे सन्त मीराबाईका आदर करते हैं, उनके पद गाते हैं । वास्तवमें भगवान् और उनके भक्तये दो ही बिना स्वार्थ सबका हित करनेवाले हैं

हेतु रहित जग  जुग  उपकारी ।
तुम्ह तुम्हार  सेवक  असुरारी ॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं ।
सपनेहुँ प्रभु  परमारथ  नाहीं ॥
                              (मानस, उत्तर ४७ । ३)

सुर नर मुनि  सब  कै यह रीती ।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥
                              (मानस, किष्किंधा १२ । १

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण तृतीया, वि.सं.२०७२, मंगलवार
कज्जली तृतीया (बहुलाव्रत)
विचार करें


(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रत्येक व्यक्तिको विचार करना चाहिये कि हमें कौन अच्छा लगता है ? जो भगवान्में, उनके भजन-स्मरणमें लगाता है, वह अच्छा लगता है कि जो संसारमें लगाता है, वह अच्छा लगता है ? जो वस्तु सदा साथ नहीं रहती, वह अच्छी लगती है कि जो सदा साथ रहती है, वह अच्छी लगती है ? शरीर-संसार हमारे साथ नहीं रहते और हम उनके साथ नहीं रहते । परन्तु धर्म हमारे साथ रहता है, ईश्वर हमारे साथ रहता है, न्याय हमारे साथ रहता है, सच्चाई हमारे साथ रहती है । विचार करें कि हम सच बोलते हैं कि झूठ बोलते हैं ? हमें न्याय अच्छा लगता है कि अन्याय अच्छा लगता है ? ईमानदारी अच्छी लगती है कि बेईमानी अच्छी लगती है ? हमें अन्याय अच्छा लगता है तो उसका फल क्या होगा ? भोग अच्छे लगते हैं तो उसका फल क्या होगा ? भोग भोगनेसे हमें लाभ हुआ है कि नुकसान हुआ है ? अपने जीवनको सँभाले और सोचें कि हम क्या कर रहे हैं ? किधर जा रहे हैं ? हमें क्या अच्छा लगता है ? भगवान्का भजन अच्छा लगता है कि संसार (भोग और संग्रह) अच्छा लगता है ? संसार क्या फायदा करता है और भगवान् क्या नुकसान करते हैं ? पाप क्या फायदा करता है और धर्म क्या नुकसान करता है ? विचार करें, देखें, सोचें

संसार साथी सब स्वार्थ के हैं,
पक्के विरोधी  परमार्थ के  हैं ।
देगा  न  कोई दुःख में  सहारा,
सुन तू किसी की मत बात प्यारा ॥

भजन-स्मरण करें तो घरवाले राजी नहीं होंगे । पर झूठ, कपट, बेईमानी करें तो घरवाले राजी हो जायँगे । विचार करो कि वे आपके फायदेमें राजी होते हैं कि आपके नुकसानमें राजी होते हैं ? इस तरफ ध्यान दो कि आपका भला चाहनेवाले और भला करनेवाले कौन-कौन हैं ? भगवान्ने हमें शरीर दिया है, पदार्थ दिये हैं, पर सब कुछ देकर भी वे हमारेपर एहसान नहीं करते । परन्तु संसार थोड़ा-सा काम करता है तो कितना एहसान करता है ? वह तो अच्छा लगता है, पर भगवान् अच्छे नहीं लगते ! भगवान्ने शरीर दिया, आँखें दीं, हाथ दिये, पाँव दिये, बुद्धि दी, विवेक दिया, सब कुछ दिया, उनसे सुख पाते हैं और भगवान्को याद ही नहीं करते ! भगवान्से मिली हुई चीज तो अच्छी लगती है, पर भगवान् अच्छे नहीं लगते । क्या यह उचित है ? स्वयं विचार करें । महाभारतमें आया हैयस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुचते........॥’ ‘जिनको याद करनेमात्रसे संसारका जन्म-मरणरूप बन्धन छूट जाता है ।’ भगवान्को याद करनेसे ही संसारके दुःख छूट जाते हैं ! कुछ मत करो, कोई चीज मत दो, केवल याद करो तो भगवान् राजी हो जाते हैं‘अच्युतः स्मृतिमात्रेण ।’

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण द्वितीया, वि.सं.२०७२, सोमवार
विचार करें


विचार करें, परमात्मा अपने हैं कि संसार अपना है ? हमें संसार प्यारा लगता है कि भगवान् प्यारे लगते हैं ? सदा हमारे साथ भगवान् रहेंगे कि संसार रहेगा ? हम परमात्माके अश हैं‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) । फिर हमें परमात्मा प्यारे न लगें, संसार प्यारा लगेयह क्या उचित बात है ? संसार तो हरदम हमसे दूर होता है, क्षणभर भी हमारे साथ नहीं रहता और परमात्मा सदा हमारे साथ रहते हैं, क्षणभर भी दूर नहीं होते । परन्तु हमारी दृष्टि परमात्माकी तरफ नहीं है, प्रत्युत संसारकी तरफ है । हम भगवान्के अंश हैं तो हमें भगवान् प्यारे लगने चाहिये । परन्तु हमें परमपिता परमेश्वर इतने प्यारे नहीं लगते, जितना संसार प्यारा लगता है । संसार साथ रहता नहीं और साथ रहेगा नहीं, रह सकता नहीं । यह एक क्षण भी साथ नहीं रहता, हरदम हमसे दूर हो रहा है । रुपये-पैसे, मकान, स्त्री, पुत्र, परिवार आदि कोई भी साथ रहनेवाला नहीं है और भगवान्का साथ छूटनेवाला नहीं है ।

शरीर-संसारका सम्बन्ध हरदम छूट रहा है । हमारी उम्रमेंसे जितने वर्ष बीत गये, उतना तो संसार छूट ही गयायह प्रत्यक्ष बात है, एकदम सच्ची तथा पक्की बात है । जिस क्षण जन्म हुआ, उसी क्षणसे शरीर-संसार हमसे दूर जा रहे हैं । संसारकी प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण बदल रही है । परन्तु अनन्त युग भले ही बीत जायँ, भगवान् नहीं बदलेंगे । वे कभी हमसे दूर नहीं होंगे, सदा साथ रहेंगे । हम सदा भगवान्के साथ हैं और भगवान् सदा हमारे साथ हैं । जो शरीर एक क्षण भी हमारे साथ नहीं रहता, वह शरीर हमें प्यारा लगता है और लोगोंकी दृष्टिमें हम भगवान्की तरफ चलनेवाले सत्संगी कहलाते हैं ! विचार करें कि वास्तवमें हम सत्संगी हुए कि कुसंगी हुए ? हम सत्का संग करते हैं कि असत्का सग करते हैं ? हमें सत् प्यारा लगता है कि असत् प्यारा लगता है ? कम-से-कम इतनी बातकी तो होश होनी चाहिये कि संसार हमारा नहीं है ।

हम परमात्माके अंश होनेसे मलरहित हैं‘चेतन अमल सहज सुखरासी परन्तु संसारका संग करनेसे मल-ही-मल लगता है, दोष-ही-दोष लगता है, पाप-ही-पाप लगता है । संसारके संगसे लाभ कोई नहीं होता और नुकसान कोई बाकी नहीं रहता । हम शरीरमें कितनी ममता रखते हैं, उसको अन्न-जल देते हैं, कपड़ा देते हैं, आराम देते हैं, उसकी सँभाल रखते हैं, पर शरीर हमारा बिलकुल कायदा नहीं रखता । रातको भूलसे भी शरीरसे कपड़ा उतर जाय तो शीत लग जाता है, बुखार आ जाता है ! रोटी देनेमें एक दिन देरी हो जाय तो शरीर कमजोर हो जाता है ! हम तो रात-दिन शरीरके पीछे पड़े हैं, पर यह हमारी परवाह नहीं करता, हमारी भूलको भी माफ नहीं करता ! फिर भी शरीर हमें प्यारा लगता है और सदा हमारा हित चाहनेवाले भगवान् और उनके भक्त प्यारे नहीं लगते !

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.२०७२, रविवार
प्रवचन‒६


(गत ब्लॉगसे आगेका)
विचार करना चाहिये कि अबतक जो धन कमाया है, मान-बड़ाई प्राप्त की है, यदि आज मर जायँ तो वह क्या काम आयेगी ? केवल अपना अमूल्य समय ही नष्ट किया । इसलिये अब चेत होना चाहिये । संसारका जो अनन्त अपार ऐश्वर्यशाली मालिक (भगवान्‌) हैं, उनसे प्रेम करेंगे तो वे भी हमसे वैसे ही प्रेम करनेको तैयार हैं‒‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।’ (गीता ४ । ११) । रुपयोंके लिये हम कितना ही झूठ, कपट, बेईमानी आदि करें; पर जाते समय रुपये हमसे सम्मति भी नहीं लेते और चुपचाप खिसक जाते है । उन्हें दया ही नहीं आती कि इसने मेरे लिये कितना झूठ, कपट, बेईमानी, अन्याय आदि पाप किये है तो कम-से-कम जाते समय इसकी सम्मति तो ले लें । जो हमारा कोई आदर नहीं करते, उनके हम पीछे पड़े है और जो हमारा आदर करता है, हमसे स्नेह, प्यार करता है, उधर जाते ही नहीं ! भगवान् हमारा कितना ध्यान रखते है । हमारा पालन-पोषण करते है और जीवन-निर्वाहका सब प्रबन्ध करते है, चाहे हम उन्हें मानें या न मानें । वे तो प्राणिमात्रके सुहद् हैं‒‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५ । २९) । इसलिये आज ही निश्चय कर लें कि अब एक भगवान्की तरफ ही चलना है, उन्हींकी खोज करनी है । फिर कल्याणमें सन्देह नहीं । एकमात्र भगवान्की तरफ चलनेपर ये जितने बड़े-बड़े वैभव हैं, वे हमारी सेवा करनेके लिये तैयार हो जायँगे । बड़े-बड़े राजा-महाराजा और देवता भी भगवद्भक्तके दास होते है और उसके दर्शनसे अहोभाग्य मानते है । वैसा हम सभी हो सकते है । संसारका वैभव इकट्ठा करनेमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं है, पर भगवान्को प्राप्त करनेमें हम सब स्वतन्त्र है । आश्चर्यकी बात है कि स्वतन्त्रतासे तो विमुख हो रहे है और परतन्त्रताको दौड़-दौड़कर ले रहे है ! इसलिये जो इस समस्त संसारका मालिक है, इसका उत्पादक, प्रकाशक और आधार है; जिसके एक अंशमें यह सारी सृष्टि स्थित है, उन अपने परमप्रियतम भगवान्से ही सम्बन्ध जोड़ लें । उन्हें चाहे माँ बना लें, चाहे पिता बना लें, चाहे पुत्र बना लें, चाहे भाई बना लें, चाहे मित्र बना लें और चाहे अर्जुनके समान सारथि बना लें, वे सब कुछ बननेको तैयार हैं । अर्जुन उनसे कहते हैं कि मेरा रथ दोनों सेनाओंके बीच खड़ा करो तो वे वैसा ही कर देते है । कितनी विचित्र बात है ! इस प्रकार आज्ञाका पालन तो आजकल बेटा भी नहीं करता । ऐसे अपने प्यारे प्रभुको छोड़कर निष्ठुर संसारकी तरफ चलना कहाँकी बुद्धिमानी है ?

अहो बकी यं स्तनकालकूटं   जिघांसयापाययदप्यसाध्वी ।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥
                                           (श्रीमद्भा ३ । २ । २३)

‘अहो ! इस पापिनी पूतनाने जिसे मार डालनेकी इच्छासे अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उसके अतिरिक्त और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायँ !
नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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