।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
कार्तिक अमावस्या, वि.सं.२०७१, गुरुवार
दीपावली
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

नाम जपते हुए बहुत विलक्षण अनुभव होने लगता है । छः कमलोंमें एक नाभिकमल है, उसकी पंखुड़ियाँमें भगवान्‌के नाम हैं, वे भी दीखने लग जाते हैं । आँखोंसे जैसे बाहरी ज्ञान होता है, ऐसे नाम-जपसे बड़े-बड़े शास्त्रोंका ज्ञान हो जाता है । जिन सन्तोंने पढ़ायी नहीं की, शास्त्र नहीं पढ़े, उनकी वाणीमें भी वेदोंकी ऋचाएँ आती हैं । वेदोंमें जैसा लिखा हैं वैसी बातें उनकी साखियोंमें, वाणियोंमें आती हैं । वेदोंका ज्ञान उनको कैसे हो गया ? ‘राम’ नाम महाराजसे । ‘राम’ नाम महाराज सब अक्षरोंकी आँख है । आँखोंसे दीखने लग जाता है, और विचित्र बातें दीखने लग जाती हैं ।

श्रीरामदासजी और श्रीलालदासजी महाराज दोनोंकी मित्रता थी । उन दोनोंकी मित्रताकी कई बातें मैंने सुनी थी । एक बार एक माई भोजन लेकर जा रही थी तो उन दोनोंने आपसमें बात कही कि वह जो माई भोजन ला रही है, उसमें राबड़ी है, अमुक साग है, और ऐसी-ऐसी चीजें हैं । और उलटा कटोरा भी साथमें है । फिर जब देखा तो वैसी ही बात मिली । इस प्रकार लौकिक द्रष्टिसे भी विशेषता आ जाती है । एकान्तमें भजन करते हुए उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि अमुक जगह अमुक बात हो रही है । इन बातोंको सन्त लोग प्रकट नहीं करते थे । ऋद्धि-सिद्धि आ जाती है और कभी कुछ बात प्रकट हो जाती है तो वे कहते कि चुप रहो, हल्ला मत करो, लोगोंको बताओ मत । अन्धेरेमें, रातमें दीखने लग जायऐसे चमत्कार होते हैं, यह तो मामूली चमत्कार है । विशेष बात यह है कि नामजपसे तत्त्वज्ञान हो जाता है । जो परमात्माका स्वरूप है, स्वयंका स्वरूप है, इन सबका अनुभव हो जाता है । यह मामूली बात है क्या ? लौकिक चमत्कार दीख जाना कोई बड़ी बात नहीं है ।

‘राम’ नाममें अपार-अनन्त शक्ति भारी हुई है । इसलिये गोस्वामीजी महाराज कहते हैंबरन बिलोचन जन जिय जोऊ’भक्तोंके हृदयको जाननेके लिये ये नेत्र हैं ।
तुलसीका प्रिय ‘राम’ नाम

सुमिरत    सुलभ    सब  काहू  ।  
लोक   लाहु  परलोक  निबाहू ॥
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके ।
राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥
                                  (मानस, बालकाण्ड २० । २,३)

ये कहने, सुनने और स्मरण करनेमें बहुत ही अच्छे सुन्दर और मधुर हैं । तुलसीदासजीको श्रीराम और लक्ष्मणके समान दोनों प्यारे है । ‘राम, राम, राम........’ कहनेमें आनन्द आता है और ‘राम, राम, राम.......’ सुननेमें आनन्द आता है । मनसे याद करें तो आनन्द आता है । ऐसे ‘राम’ नामके ये दोनों अक्षर बड़े सुन्दर और श्रेष्ठ हैं । गोस्वामीजी महाराज इस प्रकार विलक्षण बात कह रहे हैं । मानो उनको कुछ भी होश नहीं है । ‘राम’ नाम कैसा है ? सुननेवालोंके सामने द्रष्टान्त ऐसा दिया जाता है, जिसे सुननेवाले आसानीसे समझ सकें ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.२०७१, बुधवार
श्रीहनुमत्-जयन्ती, नरकचतुर्दशी
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

एक बहन थी । उसने अपने नाम-जपकी ऐसी बातें बतायीं, जो सन्तोंकी वाणीमें भी मिलती नहीं । उसने कहा कि नाम जपते-जपते शरीरमें ठण्डक पहुँचती है । सारे शरीरमें ठण्डा-ठण्डा झरना बहता है तथा एक प्रकारके मिठास और आनन्दकी प्राप्ति होती है । मैंने सन्तोंकी वाणी पढ़ी है, पर ऐसा वर्णन नहीं आता, जैसा उस बहनने अपना अनुभव बताया । ऐसे-ऐसे अलौकिक चमत्कार सन्त-महात्माओंने थोड़े-थोड़े ही लिखे हैं । वे कहाँतक लिखें ? जो अनुभव होता है, वो वर्णन करनेमें आता नहीं । वे खुद ही जानते हैं ।

सो सुख जानइ मन अरु काना ।
नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥

वह कहनेमें नहीं आता । आप इसमें लग जायँ । भाइयोंसे, बहनोंसे, सबसे मेरी प्रार्थना है कि आप नाम-जपमें लग जायँ । आप निहाल हो जायेंगे और दुनिया निहाल हो जायगी । सबपर असर पड़ेगा और आपका तो क्या कहें, जीवन धन्य हो जायगा । ‘भगवन्नाम’ की अपार महिमा है । गोस्वामीजी महाराज आगे वर्णन करते हैं

बरषा रितु रघुपति भगति  तुलसी सालि सुदास ।
राम नाम बर  बरन  जुग   सावन  भादव  मास ॥
                                         (मानस, बालकाण्ड १९)

पहले ‘राम’ नामके अवयवोंका वर्णन हुआ फिर ‘महामन्त्र’ क वर्णन हुआ । अब दो अक्षरोंका वर्णन होता है । ‘रा’ और ‘म’ये दो अक्षर हैं । जो भगवान्‌के प्यारे भक्त हैं, वे सालि (बढ़िया चावल) की खेती हैं और वर्षा-ऋतु श्रीरघुनाथजी महाराजकी भक्ति है । वर्षा-ऋतुमें खूब वर्षा हुआ करती है । चावलोंकी खेती, बाजरा आदि अनाजोंकी खेतीसे भिन्न होती है । राजस्थानमें खेतमें यदि पानी पड़ा रहे तो घास सुख जाय, पर चावलके खेतमें हरदम पानी भरा ही रहता है । जिससे खेतमें मछलियाँ पैसा हो जाती हैं । सालिके चावल बढ़िया होते हैं । चावल जितने बढ़िया होते हैं, उतना ही पानी ज्यादा माँगते हैं । उनको पानी हरदम चाहिये ।

‘रा’ और ‘म’ये दो श्रेष्ठ वर्ण हैं । ऐसे ही श्रावण और भाद्रपद इन दो मासोंकी वर्षा-ऋतु कही जाती है । श्रेष्ठ भक्तके यहाँ ‘राम’ नामरूपी वर्षकी झड़ी लगी रहती है । आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं
आखर   मधुर   मनोहर    दोऊ ।
बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ॥
                                         (मानस, बालकाण्ड २० । १)

ये दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं । ‘मधुर’ कहनेका मतलब है कि रसनामें रस मिलता है । ‘मनोहर’ कहनेका तात्पर्य है कि मनको अपनी ओर खींच लेता है । जिन्होंने ‘राम’ नामका जप किया है, उनको इसका पता लगता है, और आदमी नहीं जान सकते । विलक्षण बात है कि ‘राम-राम’ करते-करते मुखमें मिठास पैदा होता है । जैसे, बढ़िया दूध हो और उसमें मिश्री पीसकर मिला दी जाय तो वह कैसा मीठा होता है, उससे भी ज्यादा मिठास इसमें आने लगता है । ‘राम’ नाममें लग जाते हैं तो फिर इसमें अद्भुत रस आने लगता है । ऐसे ये दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं । ‘बरन बिलोचन जन जिय जोऊ’ये दोनों अक्षर वर्णमालाकी दो आँखें हैं । शरीरमें दो आँखें श्रेष्ठ मानी गयी है । आँखके बिना जैसे आदमी अन्धा होता है, ऐसे ‘राम’ नामके बिना वर्णमाला भी अन्धी है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.२०७१, मंगलवार
धनतेरस, धन्वन्तरी-जयन्ती
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

जैसे, धन कमानेवालोंके पास धन ज्यादा बढ़ जाता है तो उनके धनका लोभ भी बढ़ता जाता है । परन्तु अन्तमें वह पतन करता है, क्योंकि धन नाशवान् वस्तु है । मानो साधारण आदमीके धनका अभाव थोड़ा होता है । धनी आदमीके अभाव ज्यादा होता है । साधारण आदमीके सैकड़ोंका, धनीके हजारोंका, अधिक धनीके लाखोंका और उससे भी बड़े धनीके करोड़ोंका घाटा होता है । वैसे ही भजन करनेवालोंके भी भजनकी जरूरत होती है । जो इसकी महिमा जानते हैं, उन्हें बहुत बड़े अभावका अनुभव होता है कि हमारे भजन बहुत कम हुआ । परन्तु जो लोग भजन नहीं करते हैं, उन्हें पता ही नहीं, वे इसके माहात्म्यको जानते ही नहीं । परन्तु वे ज्यों ही अपनेमें कमी समझते है, त्यों ही भजनका माहात्म्य समझमें आता है । ऐसे माहात्म्यको समझनेवालोंके लिये लिखा है कि नामके उच्‍चारणमात्रसे कल्याण हो जाय ।

‘भगवन्नाम-कौमुदी’ नामक एक ग्रन्थ है । उसमें बड़े शास्त्रार्थ-दृष्टिसे विवेचना की गयी है । नामका उच्‍चारण करनेवाले नामके पात्र माने गये हैं । जैसे गजेन्द्रने आर्त होकर भगवान्‌का नाम लिया तो भगवान्‌ प्रत्यक्ष प्रकट हो गये । आर्त होकर जो नाम लिया जाता है, उसका बहुत जल्दी महत्त्व दीखता है । ऐसे ही भावपूर्वक नाम लिया जाता है, उसका विलक्षण ही असर होता है । एक पदमें आता है
कृष्ण नाम जब श्रवण सुने री मैं आली ।
भूली री भवन हौं तो बावरी भयी री ॥

जिन गोपिकाओंके हृदयमें भगवान्‌का प्रेम है, वे उनका नाम सुननेसे ही पागल हो जाती हैं । पता ही नहीं कि स्वयं मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ ! ऐसे ही भगवन्नामसे ऐसी दशा हो जाती है । ‘कल्याण’ के भूतपूर्व सम्पादक भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारकी नाम-निष्ठा अच्छी थी । कल्याण शुरू नहीं हुआ था, उस समयकी बात है । किसीने कह दिया‘राम नाम लेनेसे क्या होता है ?’ तो उन्होंने कहा‘कल्याण’ हो जाता है ।’ उसने कहा‘अर्थ समझे बिना क्या है ?’ ‘राम’ नाम अंग्रेजीमें मेढा और भेड़ाका भी है ।’ तब उन्होंने जोशमें आकर कह दिया, ‘राम-नामसे कल्याण होता है ।’ ऐसे जोशमें आकर कहनेसे उन्हें आठ पहरतक होश नहीं आया । खाना-पीना, टट्टी-पेशाब सब बन्द । इस बातसे उनकी माँजी बड़ी दुःखी हो गयीं कि हनुमानको क्या हो गया ? ऐसे जो भगवान्‌का नाम लेता है, उसमें बहुत विलक्षणता आ जाती है ।
नाम-जपका अनुभव

जिसकी नाममें रुचि होती है, उसे पता लगता है कि नामकी महिमा क्या होती है ? दूसरेको क्या पता नाम क्या चीज है ? हरेक आदमी क्या समझे ? नाममें रुचि ज्यादा होती है जप करनेसे, भजन करनेसे और उसमें तल्लीन होनेसे । सन्त-महात्माओंकी वाणीमें जो बातें आती हैं, वे विलक्षण बातें स्वयं अनुभवमें आने लगती हैं । सन्तोंने अलग-अलग स्थानोंपर अपना अलग-अलग अनुभव लिखा है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
कार्तिक कृष्ण द्वादशी, वि.सं.२०७१, सोमवार
गोवत्स-द्वादशी
मानसमें नाम-वन्दना



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‘अनिच्छया ही संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः’आग बिना मनके छू जायेंगे तो भी वह जलायेगी ही, ऐसे ही भगवान्‌का नाम किसी तरहसे ही लिया जाय

भाय  कुभाय  अनख  आलसहूँ ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥
                                 (मानस, बालकाण्ड २८ । १)

इसका अर्थ उलटा नहीं लेना चाहिये कि हम कुभावसे ही नाम लें और मन लगावें ही नहीं । बेगारखाते ऐसे ही नाम लेंऐसा नहीं । मन लगानेका उद्योग करो, सावधानी रखो, मनको भगवान्‌में लगाओ, भगवान्‌का चिन्तन करो, पर न हो सके तो घबराना बिलकुल नहीं चाहिये । मेरे कहनेका मतलब यह है कि मन नहीं लग सका तो ऐसा मत मानो कि हमारा नाम-जप निरर्थक चला गया । अभी मन न लगे तो परवाह मत करो; क्योंकि आपकी नीयत जब मन लगानेकी है तो मन लग जायगा । एक तो हम मन लगाते ही नहीं और एक मन लगता नहींइन दोनों अवस्थओंमें बड़ा अन्तर है । ऐसे दिखनेमें तो दोनोंकी एक-सी अवस्था ही दीखती है । कारण कि दोनों अवस्थओंमें ही मन तो नहीं लगा । दोनोंकी यह अवस्था बराबर रही; परन्तु बराबर होनेपर भी बड़ा भारी अन्तर है । जो लगाता ही नहीं, उसका तो उद्योग भी नहीं है । उसका मन लगानेका विचार ही नहीं है । दूसरा व्यक्ति मनको भगवान्‌में लगाना चाहता है, पर लगता नहीं । भगवान्‌ सबके हृदयकी बात देखते हैं

रहति न प्रभु चित चूक किए की ।
करत सुरति  सय  बार  हिए की ॥
                                     (मानस, बालकाण्ड २९ । ५)

भगवान्‌ हृदयकी बात देखते हैं, कि यह मन लगाना चाहता है, पर मन नहीं लगा । तो महाराज ! उसका बड़ा भारी पुण्य होगा । भगवान्‌पर उसका बड़ा असर पड़ेगा । वे सबकी नीयत देखते हैं । अपने तो मन लगानेका प्रयत्न करो, पर न लगे तो उसमें घबराओ मत और नाम लिये जाओ ।
राम !   राम !!   राम !!!
नाम-जपका अनुभव

‘राम’ नामकी वन्दनाका प्रकरण चल रहा है । इसमें ‘राम’ नामकी महिमाका वर्णन भी आया है । इसकी महिमा सुननेसे ‘राम’ नाममें रुचि हो सकती है, पर इसका माहात्म्य तो ‘राम’ नाम जपनेसे ही मिलता है । नाम-महिमा कहने और सुननेसे उसमें रुचि होती है और नाम-जप करनेसे अनुभव होता है, इसलिये बड़ी उपयोगी बात है । इसकी वास्तविकता जपनेसे ही समझमें आयेगी, पूरा पता उससे ही लगेगा । जैसे, भूखे आदमीको भोजनकी बात बतायी जाय तो उसकी रुचि विशेष हो जाती है । पर बिना भूखके भोजनमें उतना रस नहीं आता । जोरसे भूख लगती है, तब पता लगता है कि भोजन कितना बढ़िया है ! वह रुचता है, जँचता भी है और पच भी जाता है । उस भोजनका रस बनता है, उससे शक्ति आती है । ऐसे ही रुचिपूर्वक नामका जप करनेसे ही नामका माहात्म्य समझमें आता है, इसलिये ज्यों-ज्यों अधिक नाम जपते हैं, त्यों-ही-त्यों उसका विशेष लाभ होता है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
कार्तिक कृष्ण एकादशी, वि.सं.२०७१, रविवार
रम्भा एकादशी-व्रत (सबका)
मानसमें नाम-वन्दना



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प्रथम   राम   रसना   सिवर,    द्वितीय   कण्ठ   लगाय ॥
तृतीय   हृदय   ध्यान   धर,     चौथे    नाभ    मिलाय ॥
अध मध उत्तम प्रिय घर ठानु, चौथे अति उत्तम अस्थानु ॥
ये चहुँ बिन देखे आसरमा, राम भगति को पावे मारमा ॥
                                                              (नामापरचा)

ऐसे जब ‘राम’ नाम भीतर उतरेगा तो भीतर जानेपर वह सब काम कर लेगा । शुद्धि, पवित्रता, निर्मलता, भगवान्‌की भक्तिजो आनी चाहिये सब आ जायगी । इसलिये गोस्वामीजी महाराजने बड़ी विचित्र बात लिखी‘नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी ।’ और कुछ नहीं तो जीभसे ही जपो । ‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’भगवान्‌के नामका जप करे और भीतर-ही-भीतर ध्यान होता रहेउसका तो फिर कहना ही क्या है ! जीभमात्रसे नाम जपनेसे योगी जाग जाता है | जो नाम जप करते हैं, जीभमात्रसे ही, वे भी ब्रह्माजीके प्रपंचसे वियुक्त होकर विरक्त सन्त हो जाते हैं । जीभमात्रसे जप करना है भी सुगम ।

बहुतसे लोग कह देते हैं‘तुम नाम-जपते हो तो मन लगता है कि नहीं लगता है ? अगर मन नहीं लगता है तो कुछ नहीं, तुम्हारे कुछ फायदा नहींऐसा कहनेवाले वे भाई भोले हैं, वे भूलमें हैं, इस बातको जानते ही नहीं; क्योंकि उन्होंने कभी नाम-जप करके देखा ही नहीं । पहले मन लगेगा, पीछे जप करेंगेऐसा कभी हुआ है ? और होगा कभी ? ऐसी सम्भावना है क्या ? पहले मन लग जाय और पीछे ‘राम-राम’ करेंगेऐसा नहीं होता । नाम जपते-जपते ही नाम-महाराजकी कृपासे मन लग जाता है ‘हरिसे लागा रहो भाई । तेरी बिगड़ी बात बन जाई, रामजीसे लागा रहो भाई ॥’ इसलिये नाम-महाराजकी शरण लेनी चाहिये । जीभसे ही ‘राम-राम’ शुरू कर दो, मनकी परवाह मत करो । ‘परवाह मत करो’इसका अर्थ यह नहीं है कि मन मत लगाओ । इसका अर्थ यह है कि हमारा मन नहीं लगा, इससे घबराओ मत कि हमारा जप नहीं हुआ । यह बात नहीं है । जप तो हो ही गया, अपने तो जपते जाओ । हमने सुना है

माला  तो  करमें  फिरे,  जीभ  फिरे  मुख  माहिं ।
मनवाँ तो चहुँ दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं ॥

‘भजन होगा नहीं’यह कहाँ लिखा है ? यहाँ तो ‘सुमिरन नाहिं’ऐसा लिखा है । सुमिरन नहीं होगा, यह बात तो ठीक है; क्योंकि ‘मनवा तो चहुँ दिसि फिरे’ मन संसारमें घूमता है तो सुमिरन कैसे होगा ? सुमिरन मनसे होता है; परन्तु ‘यह तो जप नाहिं’ऐसा कहाँ लिखा है ? जप तो हो ही गया । जीभमात्रसे भी अगर हो गया तो नाम-जप तो हो ही गया ।

हमें एक सन्त मिले थे । वे कहते थे कि परमात्माके साथ आप किसी तरहसे ही अपना सम्बन्ध जोड़ लो । ज्ञानपूर्वक जोड़ लो, और मन-बुद्धिपूर्वक जोड़ लो तब तो कहना ही क्या है ? और नहीं तो जीभसे ही जोड़ लो । केवल ‘राम’ नामका उच्‍चारण करके भी सम्बन्ध जोड़ लो । फिर सब काम ठीक हो जायगा ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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