।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण दशमीवि.सं.२०७१बुधवार
एकादशी-व्रत कल है
नाम-महिमा



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
दक्षिणमें पण्ढरपुर है । वहाँ नामदेवजी महाराज,ज्ञानदेवजी महाराजसोपानदेवजी आदि कई नामी सन्त हुए हैं । बड़ी विचित्र उनकी वाणी है । वहाँ दक्षिणमें चोखामेला नामका एक चमार था । विट्ठल-विट्ठल-विट्ठल‒ऐसे भगवान्‌का नाम जपता था । पण्ढरपुरके पास ही एक मंगलबेड़ा गाँव है । उसी गाँवमें वह रहता था । वहाँ एक मकान बन रहा था । उस मकानमें चोखामेला काम कर रहा था । मजदूरी करके वह अपनी जीविका चलाता था । अचानक वह मकान गिर पड़ा । मकान बहुत बड़ा थागिर गया और उसमें चोखामेला दब गया । उसके साथ कई आदमी दबकर मर गये । उनको उसमेंसे निकालने लगे तो निकालते-निकालते कई महीने लग गये । उन सबको निकाला तो उनकी केवल हड्डियाँ पड़ी मिलीं । अब किसकी कौन-सी हड्डियाँ हैंइसकी पहचान नहीं हो सकती । थोड़े दिनमें तो शरीरकी पहचान भी हो जाय । अब चोखामेलाकी हड्डियोंकी पहचान कैसे हो तो शायद नामदेवजीने कहा हो कि भाईउनकी हड्डियोंको कानमें लगाकर देखो । जिसमें विट्ठल-विट्ठल नामकी ध्वनि होती होवह हड्डी चोखामेलाकीयह पहचान है । कितने आश्चर्यकी बात है कि मरनेके बाद भी हड्डीसे नाम निकलता है ! भगवान्‌का नाम लेते-लेते भक्त नाममय ही हो जाते हैं‒‘चंगा राख तन, मन, प्राण, रहीये नाममें गलतान ।’ बससब लोग इसमें गलतान हो जाओइस नाममें तल्लीन हो जाओ । तत्परतासे नाम लेनेवाले ऐसे सन्त हुए हैं ।

अर्जुनके भी शरीरमेंसे भगवान्‌का नाम निकलता था । एक दिन अर्जुन सो रहे थे और नींदमें ही नाम-जप हो रहा था । शरीरके रोम-रोममेंसे कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण नामका जप हो रहा था । नामको सुन करके भगवान् श्रीकृष्ण आ गयेउनकी स्त्रियाँ भी आ गयीं । नारदजी आ गयेशंकरजी आ गये,ब्रह्माजी आ गयेदेवता आ गये । भगवान् शंकर नाम सुन-सुन करके नाचने लगेनृत्य करने लगे । अर्जुनके तो बेहोशीमें‒गाढ नींदमें भी रोम-रोमसे कृष्ण-कृष्ण निकलता है । इसमें कारण यह है कि जिसका जो इष्ट होता हैवह उसीका नाम जपता हैतो वह नाम भीतर बैठ करके रग-रगमें होने लगता है । हरिरामदासजी महाराजकी वाणीमें आता है‒‘रग-रग आरम्भा, भये अचम्भा छुछुम भेद भणन्दा है ।’ सन्तोंकी वाणी आपलोग पढ़ते ही हो । उसमें आपलोग देखो । ऐसा उनका भजन होने लगता हैक्यों उनकी वह लगन है । वे उसीमें ही तल्लीन हो गये । मनबुद्धिइन्द्रियाँ नाममें लग गयींप्राण उसमें लग गये । शरीरमात्रमें नाम-जप होने लगा । कितने महान्पवित्रदिव्य उनके शरीर थे कि उनको याद करनेमात्रसे जीवका कल्याण हो जाय । वे तो नाम-रूप ही बन गयेभगवत्स्वरूप बन गये । नारदजी महाराज अपने भक्ति-सूत्रमें लिखते हैं कि भगवान् और भगवान्‌के जनोंमें भेद नहीं होता‒‘तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्’क्योंकि वे उनके हैं, उस परमात्माके अर्पित हो गये हैं‒‘यतस्तदीयाः ।’

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण नवमीवि.सं.२०७१मंगलवार
रोहिणी मतावलम्बियोंका जन्माष्टमीव्रत
नाम-महिमा



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मेरेको एक सज्जन मिले थे । वे कहते थे कि मैं राम-राम करता हूँ तो राम-नामका चारों तरफ चक्कर दीखता है । ऊपर आकाशमें और सब जगह ही राम-राम दीखता है । पासमेंचारों तरफदसों दिशाओंमें नाम दीखता है । पृथ्वी देखता हूँ तो कण-कणमें नाम दीखता हैराम-राम लिखा हुआ दीखता है । कोई जमीन खोदता है तो उसके कण-कणमें नाम लिखा हुआ दीखता है । ऐसी मेरी वृत्ति हो रही है कि सब समयसब जगह, सब देशसब कालसब वस्तु और सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें राम-नाम परिपूर्ण हो रहा है । यह कितनी विलक्षण बात है ! कितनी अलौकिक बात है !

भगवान् रामजीने लंकापर विजय कर ली । अयोध्यामें आ करके गद्दीपर विराजमान हुए तो उस समय राजाओंने रामजीको कई तरहकी भेंट दी । विभीषणने रावणके इकट्ठे किये हुए बहुत कीमती-कीमती रत्नोंकी माला बनायी थी । माला बनानेमें यही उद्देश्य था कि जब महाराजका राज्यतिलक होगातब मैं भेंट करूँगा । इस तरहसे विभीषण वह माला लाया और समय पाकर उसने महाराजके गलेमें माला पहना दी । महाराजने देखा कि भाई,गहनोंकी शौक स्त्रियोंके ज्यादा होती हैऐसे विचारसे रामजीने वह माला सीताजीको दे दी । सीताजीको जब माला मिली तो उनके मनमें विचार आया कि मैं यह माला किसको दूँ ! महाराजने तो मेरेको दे दी । अब मेरा प्यारा कौन है हनुमान्‌जी पासमें बैठे हुए थे । हनुमान्‌जी महाराजपर सीतामाताका बहुत सेह थाबड़ा वात्सल्य था और हनुमान्‌जी महाराज भी माँके चरणोंमें बड़ी भारी भक्ति रखते थे । माँने हनुमान्‌जीको इशारा किया तो चट पासमें चले गये । माँने हनुमान्‌जीको माला पहना दी । हनुमान्‌जी बड़े खुश हुए प्रसन्न हुए । वे रत्नोंकी ओर देखने लगे । जब माँने चीज दी है तो इसमें कोई विशेष बात है‒ऐसा विचार करके एक मणिको दाँतोंसे तोड़ दियापर उसमें भगवान्‌का नाम नहीं था तो उसे फेंक दिया । फिर दूसरी मणि तोड़ने लगे तो वहाँपर बड़े-बड़े जौहरी बैठे थे । उन्होंने कहा‒‘बन्दरको तो अमरूद देना चाहिये ! यह इन रत्नोंका क्या करेगा रत्नोंको तो यह दाँतोंसे फोड़कर फेंक रहा है ।’किसीने उनसे पूछा‒‘क्यों फोड़ते हो क्या बात है क्या देखते हो ? हनुमान्‌जीने कहा‒‘मैं तो यह देखता हूँ कि इनमें भगवान्‌का नाम है कि नहीं । इनमें नाम नहीं है तो ये मेरे क्या कामके इस वास्ते इनको फोड़कर देख लेता हूँ और नाम नहीं निकलता तो फेंक देता हूँ ।’

उनसे फिर पूछा गया‒‘बिना नामके क्या तुम कुछ रखते ही नहीं ? हनुमान्‌जीने कहा‒‘नाबिना नामके कैसे रखूँगा ? फिर पूछा गया‒‘तो तुम शरीरको कैसे रखते हो ?तब हनुमान्‌जीने नखोंसे शरीरकी त्वचाको चीर करके दिखाया । सम्पूर्ण त्वचामें जगह-जगहरोम-रोममें राम,रामरामराम लिखा हुआ था‒‘चीरके दिखाई त्वचा अंकित तमाम, देखी चाम राम नामकी ।’ तो जो नाम जपनेवाले सज्जन हैंवे नाममय बन जाते हैं ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण अष्टमीवि.सं.२०७१सोमवार
नाम-महिमा



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
ब्याहा हुआ लड़का मर जाय तो हृदयमें एक चोट पहुँचती है कि ऐसा कमानेवाला सुपुत्र बेटा मर गया तो उससे भी ज्यादा दुःख होना चाहिये एक नाम-उच्चारण करें इतना खाली समय जानेपर । क्योंकि जो लड़के छोटे हैं वे बड़े हो जायँगे । गृहस्थोंके और फिर पैदा भी हो जायँगे । परन्तु समय थोड़े ही पैदा हो जायगा । जो समय खाली गया,वह जो घाटा पड़ावह तो पड़ ही गया । इस वास्ते हमें सावधानी रखनी चाहिये कि हमारा समय बरबाद न हो जाय‒‘जो दिन जाय भजनके लेखे, सो दिन आसी गिणतीमें’वह दिन गिनतीमें आवेगा । बिना भजनके जो समय गया,उसकी कोई कीमत नहींवह तो बरबाद हो गया । बड़ा भारी नुकसान हो गयाघाटा लग गया बड़ा भारी !

अबतक जो समय संसारमें लग गयावह तो लग ही गया । अब सावधान हो जायँ । सज्जनो ! भाइयो-बहिनो ! दिनमें थोड़ी-थोड़ी देरीमें देखो कि नाम याद है कि नहीं ।घरमें जगह-जगह भगवान्‌का नाम लिख दो और याद करो । भगवान्‌की तस्वीर इस भावसे सामने रख दो कि वे हमें याद आते रहें । हमें भगवान्‌को याद करना है । घरमें भगवान्‌का चित्र रखो पर इस भावनासे रखो कि तस्वीरपर हमारी दृष्टि पड़ते ही हमें भगवान् याद आयें । ऐसे भावसे रखकर सुन्दर-सुन्दर नाम लिख दो । जहाँ ज्यादा दृष्टि पड़ती होवहाँ नाम लिख दो ।

ऐसे गृहस्थके घरको मैंने देखा है । सीढ़ीसे उतरते हैं तो वहाँ नाम लिखा हुआ । सीढ़ीसे ऊपर चढ़ते हैं तो सामने नाम लिखा हुआ । जहाँ घूमते-फिरते हैंवहाँ नाम लिखा हुआ । वे नाम इस वास्ते लिखे कि मैं भूल न जाऊँप्रभुके नामकी भूल न हो जाय । ऐसी सावधानी रखो सज्जनो ! यह असली काम है असली ! बड़ा भारी लाभ है इसमें‒‘भक्ति कठिन करूरी जाण ! ड़समें नफा घणा नहीं हाण ॥’ इसमें नुकसान है ही नहीं । केवल नफा-ही-नफा है । बसफायदा-ही-फायदा है । इस प्रकार अपना सब समय सार्थक बन जाय‒‘एक भी श्वास खाली खोय ना खलक बीच ।’

संसारके भीतर जो समय खाली चला गया तो बड़ा भारी नुकसान हो गया । श्रीदादूजी महाराज फरमाते हैं‒‘दादू जैसा नाम था तैसा लीन्हा नाय ।’ इस नामकी जितनी महिमा हैवैसा नाम नहीं लियाजब कि उन्होंने उम्रभरमें क्या किया नाम ही तो जपा । परन्तु उनको लगता है कि नाम जैसा जपना चाहिये था वैसा नहीं जपा अर्थात् मुखसे जितना नाम लेना थाउतना नहीं लिया । अब‘देह हलावा हो रहा’ देहमेंसे बसप्राण गये... गये... ऐसी उनकी दशा हो रही हैपर वे कहते हैं‒‘हुंस रही मन माय’भगवान्‌का नाम और लेतेऔर लेते । जैसेधन कमानेवालेका लोभ जाग्रत् होता है तो उसके पास लाखों,करोड़ों रुपये हो जानेपर भी फिर नये-नये कारखाने खोलकर और धन ले लूँ‒ऐसा लोभ बढ़ता ही रहता है । यह धन तो यहीं रह जायगा और हमारा समय बरबाद हो जायगा । यदि भगवान्‌में लग जाओगे तो नामका वैसे लोभ लगेगा जैसे सन्तोंने प्रार्थना की है कि हे भगवान् ! हमारी एक जिह्वासे नाम लेते-लेते तृप्ति नहीं हो रही हैइस वास्ते हमारी हजारों जिह्वा हो जायँ, जिनसे मैं नाम लेता ही चला जाऊँ । उनकी ऐसी नामकी लालसा बढ़ती ही चली जाती है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण सप्तमीवि.सं.२०७१रविवार
श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत
नाम-महिमा



 (गत ब्लॉगसे आगेका)
नामकी तो अपार असीम महिमा है । वह नाम हर समय लिया जा सकता है । काम-धन्धा करते हुएउठते-बैठतेसोते-जागतेखाते-पीते आदि हर समयमें भगवान्‌का नाम लिया जा सकता है । चैतन्य महाप्रभु कहते हैं‒भगवान्‌ने नाममें अपनी पूरी-की-पूरी शक्ति (महिमा) रख दी है और इसमें विलक्षणता यह है कि इसके लेनेमें कोई समय नहीं बाँधा गया है कि अमुक समयमें नाम ले सकते होउसके सिवाय नहींप्रत्युत भगवान्‌ने तो नाम लेनेमें सब समय छूट दे रखी है । नामको तो सुबहशामदोपहररात्रि‒हर समय ले सकते हैं‒
                        नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
                                स्तत्रार्पितानियमितः स्मरणे न कालः ।
                        एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
                                दुर्दैवमीदृशमिहाजनि        नानुरागः ॥

कई लोग कहते हैं कि क्या करेंहमारे नाम लेना लिखा नहीं है । सज्जनो ! अभी नाम-जप करके नाम लिखा लोइसमें देरीका काम नहीं है । इसका दफ्तर हर समय खुला हैकभी करो । दिनमेंरातमेंसुबहमेंशाममें,सम्पत्तिमेंविपत्तिमेंसुखमेंदुःखमें आप भगवान्‌का नाम लें तो अभी लिखा जायगा और नामकी पूँजी हो जायगी । अब नामको भूल न जायँ, इसका खयाल रखना है । उसके लिये एक उपाय बतायें । आपलोग ध्यान देकर सुनें । आपलोग मन-ही-मन भगवान्‌को प्रणाम करके उनसे यह प्रार्थना करें‒‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहींहे प्रभो ! आपको मैं भूलूँ नहीं’ऐसा मिनट-मिनटआधे-आधे मिनटमें आप कहते रहो । नींद खुले तबसे लेकर गाढ़ी नींद न आ जाय तबतक ‘हे प्रभो ! आपको मैं भूलूँ नहीं ।’ ऐसा कहते रहो । राम-राम-राम कहते हुए साथमें कह दें‒‘हे नाथ ! मैं भूलूँ नहीं ।’

जब आप राम-राम-राम कह रहे हैंराम-राम-राम कहते हुए भी मनसे दूसरी बात याद आ जाती हैउस समय हम भगवान्‌को भूल जाते हैं तो भगवान्‌से कहो‒‘हे नाथ ! मैं भूलूँ नहींहे प्रभो ! भूलूँ नहीं । हे नाथ ! मैं आपका नाम लेता रहूँ और आपको भूलूँ नहीं ।’ भगवान्‌से ऐसी प्रार्थना करते रहो तो भगवान्‌की कृपासे यह भूल मिट जायगी । भजन होने लगेगा । फिर अखण्ड भजन होगाअखण्ड ! ‘ताली लागी नामसे और पड्यो समँदसे सीर’ भगवान्‌के नामकी धुन लग जायगी । फिर आपको भीतर स्मरण करनेका उद्योग नहीं करना पड़ेगा । स्वतः ही भगवान्‌की कृपासे भजन चलेगा । परन्तु पहले आप नाम लेनेकी चेष्टा करो और भगवान्‌से प्रार्थना करो ।

कोई १९६०‒६५ विक्रम संवत्‌की बात होगीहमें मिति ठीक याद नहीं है । मैंने एक सन्तका पत्र पढ़ा थाजो कि उन्होंने अपने प्रेमीके प्रति दिया हुआ था । छोटा कार्ड था । पहले छोटा कार्ड हुआ करता था । एक-दो पैसेके कार्डमें मैंने समाचार पढ़ा था । अपने सेवकके प्रति लिखा था‒‘एक नाम छूट जायइतना काल‒समय अगर खाली चला जाय,तो ब्याहा हुआ बड़ा बेटा मरेउससे भी ज्यादा शोक होना चाहिये ।’ राम ! राम ! राम ! गजब हो गया ! यह लिखा था उसमें ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण षष्ठीवि.सं.२०७१शनिवार
हलषष्ठी (ललहीछठ)
नाम-महिमा



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हाथ काम मुख राम हैहिरदे साँची प्रीत ।
दरिया गृहस्थी साध की याही उत्तम रीत ॥

जो हाथसे तो काम-धन्धा करते रहे और मुखसे राम राम राम.....चलता रहे और हृदयमें भगवान्‌से अपनापन हो,वह गृहस्थी सन्त है । इस साधनको सभी भाई-बहन स्वतन्त्रतासे कर सकते हैं । हृदयमें भगवान्‌के प्रति सच्चा प्रेम हो कि भगवान् हमारे हैं और हम भगवान्‌के हैं । संसार हमारा नहीं है और हम संसारके नहीं हैं । संसारकी सेवा कर देनी हैक्योंकि संसारकी सेवाके लिये ही यहाँ आना हुआ है । संसारसे लेनेके लिये नहीं आये हैं हम । यहाँ लेना कुछ नहीं है । यहाँकी ये चीजें साथ चलेंगी नहीं । मेरी-मेरी कर लोगे तो अन्तःकरणमें मेरेपनका जो संस्कार पड़ेगावह जन्म देगा,दुःख देगा‒
मायामें रह जाय बासना अजगर देह धरासी ।

रुपये-पैसोमें वासना रह गयी तो साँप बनना पड़ेगा । धन साथमें नहीं चलेगा और यदि भगवद्भजन कर लोगे तो वह साथमें चलेगा । वह असली पूँजी है‒
राम  नाम  धन  पायो  प्यारा,
जनम जनमके मिटत बिकारा ।
‒   ‒   ‒
पायो री मैंने राम रतन धन पायो ।

सन्तोंकी वाणीमें जहाँ गुरु महाराजकी महिमा गायी हैउसमें कहा है‒गुरुजी महाराज बड़े दाता मिले । उन्होंने हमारेको भगवान्‌का नाम देकर धनवान् बना दिया‒‘धिन-धिन धनवंत कर दिया गुरू मिलिया दातारा ।’ सज्जनो ! इसकी कीमत समझनेपर फिर महिमा समझमें आती है कि नाम कितना विलक्षण है । सन्त-महात्माओंसे जिनको नाम प्राप्त हुआ हैवे लोग गुण गाते हैं । जो अच्छे-अच्छे महापुरुष हो गये हैंवे भी गुरुकी महिमा गाते हैं । किस बातको लेकरकि महाराजने हमारेको भगवान्‌का नाम दे दिया ।

उस नामसे क्या-क्या आनन्द होता हैउसका कोई पारावार नहीं । नाम महाराजकी अपार महिमा हैअसीम महिमा है । गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज सीतारामजीको इष्ट मानते हैं और वे उनके अनन्य भक्त हैंपरन्तु नामकी महिमा गाते हुए वे कहते हैं‒‘कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । राम न सकहिं नाम गुन गाई ॥’ नामकी महिमा मैं कहाँतक कहूँभगवान् राम भी नामकी महिमा कह सकते नहीं । अपने इष्टको भी असमर्थ बता देते हैं अर्थात् इस नामकी महिमाके विषयमें हमारे श्रीरघुनाथजी भी असमर्थ हैं । भाईनामकी महिमा यहाँतक है, यहाँतक हैऐसा कहनेमें भगवान् भी असमर्थ हैं । अपने इष्टको भी असमर्थ बता देना क्या तिरस्कार नहीं है नहींनहींआदर है । कैसे इस नामकी इयत्ता (सीमा) है ही नहीं कि भाईइसकी इतनी-इतनी महिमा है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे


।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद कृष्ण पंचमीवि.सं.२०७१शुक्रवार
स्वतन्त्रतादिवस
नाम-महिमा



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आज दिनतकके समयमें हमने जो संग्रह किया हैउस संग्रहके बदलेमें हमारा गया हुआ समय मिलेगा क्या नहीं मिलेगा । ऐसे समय बरबाद न होइसके लिये आजसे ही विशेषतासे सावधान हो जायँ । हम विशेष सावधान तभी हो सकते हैंजब निर्णय करके आयें कि हम क्या चाहते हैं । यदि हम रुपये-पैसे चाहते हैंमान-बड़ाई चाहते हैंनीरोगता चाहते हैंसदा जीते रहना चाहते हैं तो ये सब बातें कभी नहीं हो सकतींअसम्भव हैं ।

मनुष्योंको इसका भी होश नहीं है कि हम क्या चाहते हैं ? हमारी असली चाह क्या है‒इसका भी पता नहीं है;क्योंकि हम खोज ही नहीं करतेइधर ध्यान ही नहीं देते कि वास्तवमें हमारी चाह क्या है । इस वास्ते सज्जनो ! इसमें तो स्वयं आपको सोचना होगा । इसमें कोई सहारा देनेवाला नहीं है । जब मृत्यु आयेगीउस समयमें प्यारे-से-प्यारे,ज्यादा स्नेह रखनेवाले रो देंगे । इसके सिवाय और क्या कर सकते हैं वे कुछ भी सहायता नहीं कर सकते । अगर आप भजन करतेभगवान्‌में लगते तो क्या यह दुर्दशा होती ?

धनवंता सोई जानिये जाके राम-नाम धन होय ।

राम-नामरूपी धन पासमें होता तो मरनेपर वह पूँजी साथमें चलती । भजन आपने किया हैभगवान्‌का नाम लिया हैभगवान्‌का चिन्तन किया हैसद्भावोंका संग्रह किया हैअपनी प्रकृति सुधार ली है अर्थात् अपने स्वभावका सुधार कर लिया है तो वह आपके साथ चलेगा । परन्तु यहाँकी चीजें बटोरी हैंये साथमें नहीं चलेंगी । स्वभावमें जो बात आ गयीवह साथमें चलेगी । आपने अपना स्वभाव जितना शुद्ध बना लियाउतना आपने काम कर लिया । जितना भजन आपने कर लियाआपने उतना संग्रह कर लियाउतनी साथ जानेवाली पूँजी हो गयी । यह पूँजी ऐसी विलक्षण है कि सांसारिक धनको चुरानेवाले जो चोर-डाकू हैं न वे भी उस पूँजीको चुरा नहीं सकते । आपकी सांसारिक पूँजीपर डाका पड़ता हैपरन्तु भजनरूपी पूँजीपर डाका नहीं पड़ता । शरीर यहाँ रहेगा तो वह पूँजी आपके साथ रहेगी और शरीर जायगा तो वह पूँजी आपके साथ जायगी । इसका भार नहीं होगाबोझा नहीं होगा ।

यहाँ संसारमें रहते हुए भाई अलग-अलग होते हैंतो उनमें पूँजीकाघरका बँटवारा होता हैपरन्तु आपके इस धनका कभी बँटवारा नहीं होगा कि इतना उसके हिस्सेमें आता है । इतना अमुक-अमुकके हिस्सेमें आता है । पर यह धन कभी घटता नहीं और कभी मिटता भी नहीं । परमात्माकी प्राप्ति करा देता है । दुःखोंका सदाके लिये अन्त करा देता है । महान् आनन्दकी प्राप्ति करा देता है । ऐसा भजन करनेके लिये हमारी जीभ सदा खुली है । खास बात हो तो बोलोउसके सिवाय नाम जपते रहो ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘भगवन्नाम’ पुस्तकसे