।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष अमावस्या, वि.सं.२०७१, शनिवार
अमावस्या
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

संतोंका स्वभाव

संतोंके अभिमान नहीं होता । वे भगवान्‌के प्यारे होते हैं और सबको बड़ा मानते हैं ।

सीय राममय  सब जग जानी ।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
                               (मानस, बालकाण्ड, दोहा ८ । २)

जितने पुरुष हैं, वे हमारे रामजी हैं और जितनी स्त्रिया हैं, वे सब सीताजी‒माँ हैं । इस प्रकार उनका भाव होता है । मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंतवे सबको भगवान् मानते हैं, इस कारण उनके भीतर अभिमान नहीं आता । वे ही भगवान्‌को प्यारे लगते हैं; क्योंकि निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोधवे किसके साथ विरोध करें ।

श्रीचैतन्य-महाप्रभुके समयमें जगाई-मधाई नामके पापी थे । उनको नित्यानन्दजीने नाम सुनाया तो उन्हें खूब मारा । मार-पीट सहते हुए वे कहते कि तू हरि बोल, हरि बोल । उनपर भी कृपा की । चैतन्य-महाप्रभुने उनको भक्त बना दिया । उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि जो अधिक पापी, धनी एवं पण्डित होते हैं, उनपर विशेष कृपा करनी चाहिये; क्योंकि उनको चेत कराना बड़ा मुश्किल होता है । और उपायोंसे तो ये चेतेंगे नहीं, भक्तिकी बात सुनेंगे ही नहीं; क्योंकि उनके भीतर अभिमान भरा हुआ है । चैतन्य-महाप्रभुने ऐसे लोगोंके द्वारा भी भगवन्नाम उच्चारण करवाकर कृपा की । भगवान्‌के नाम-कीर्तनमें वे सबको लगाते । पशु-पक्षीतक खिंच जाते उनके भगवन्नाम-कीर्तनमें ।

जग पालक बिसेषि जन त्राताऐसे नाम महाराज दुष्टोंका भी पालन करनेवाले, अभिमानियोंका अभिमान दूर कराकर भजन करानेवाले एवं साधारण मनुष्योंको भी भगवान्‌की तरफ लगानेवाले हैं । ये सबको लगाते हैं कि सब भगवान्‌के प्यारे बन जायँ । सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाःकेवल नीरोग ही नहीं, भगवान्‌के प्यारे भक्त बन जायँ‒यह उन नाम-महाराजकी इच्छा रहती है । इसी प्रकार संतोंके दर्शनसे भी बड़ा पुण्य होता है, बड़ा भारी लाभ होता है । क्यों होता है ? उनके हृदयमें भगवद्‌बुद्धि बनी रहती है और वे सबकी सेवा करना चाहते हैं । इस कारण उनके दर्शनमात्रका असर पड़ता है । स्मरणमात्रका एवं उनकी बातमात्रका असर पड़ता है । क्योंकि उनके हृदयमें भगवद्भाव और सेवा-भाव लबालब भरे रहते हैं । इसलिये उनके दर्शन, भाषण, स्पर्श, चिन्तन आदिका लोगोंपर असर पड़ता है, लोगोंका बड़ा भारी कल्याण होता है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.२०७१, शुक्रवार
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

दूसरे दिन फिर वह धोती और लोटा लेकर गया । वहीं वही संत बैठे थे । उस सेठको देखकर संतने कहा‒‘राम- राम !तब उसकी आँख खुली कि यह सब इन संतका चमत्कार है । संतने कहा‒‘तुम भगवान्‌का नाम लिया करो, हरेकका तिरस्कार, अपमान मत किया करो । जाओ, अब तुम अपने घर जाओ ।वह सेठ सदाकी तरह चुपचाप अपने घर आ गये ।

अभिमानमें आकर लोग तिरस्कार कर देते हैं । धनका अभिमान बहुत खराब होता है । धनी आदमीके प्रायः भक्ति लगती नहीं । धनी आदमी भक्त होते ही नहीं, ऐसी बात भी नहीं है । राजा अम्बरीष भक्त हुए हैं । और भी बहुत-से धनी आदमी भगवान्‌के भक्त हुए हैं; परंतु धनका अभिमान उनके नहीं था । उन्हें धनकी परवाह नहीं थी । भगवान् अभिमानको अच्छा नहीं समझते‒ अभिमानद्वेषित्वाद्दैन्यप्रियत्वाच्च । नारदजी-जैसे भक्तको भी अभिमान आ गया । जिता काम अहमिति मन माहीं । (मानस, बालकाण्ड, दोहा १२७ । ५) अभिमानकी अधिकता आ गयी कि मैंने कामपर विजय कर ली तो क्या दशा हुई उनकी ? भगवान् अपने भक्तका अभिमान रहने ही नहीं देते ।
ताते करहिं कृपानिधि  दूरी ।
सेवक पर ममता अति भूरी ॥
                            (मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ७४ । ७)

अभिमानसे बहुत पतन होता है । उस अभिमानको भगवान् दूर करते हैं । आसुरी सम्पत्ति और जितने दुर्गुण-दुराचार हैं, सब-के-सब अभिमानकी छायामें रहते हैं । महाभारतमें आया है‒बहेड़ेकी छायामें कलियुगका निवास है, ऐसे ही सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका निवास अभिमानकी छायामें है । धनका, विद्याका भी अभिमान आ जाता है । हम साधु हो जाते हैं तो वेश-भूषाका भी अभिमान आ जाता है कि हम साधु हैं । हमें क्या समझते हो‒यह भी एक फूँक भर जाती है । अरे भाई, फूँक भर जाय दरिद्रताकी । धनवत्ताकी भरे उसमें तो बात ही क्या है ! धनीके यहाँ रहनेवाले मामूली नौकर आपसमें बात करते हैं‒कोई भाग्यके कारण पैसे मिल गये; परंतु सेठमें अक्ल नहीं है ।उनको पूछा जाय, ‘तुम ऐसे अक्लमन्द होकर बेअकलके यहाँ क्यों रहते हो’ ? ऐसे ही पण्डितोंको अभिमानी लोग कहते हैं‒पढ़ गये तो क्या हुआ अक्ल है ही नहीं ।’ मानो अक्ल तो सब-की-सब उनके पास ही है । दूसरे सब बेअक्ल हैं ।

अकलका अधूरा और गाँठका पूरा मिलना बड़ा मुश्किल है । धन मेरे पास बहुत हो गया, अब धनकी मुझे जरूरत नहीं है और मेरेमें समझकी कमी है, थोड़ा और समझ लूँ‒ऐसे सोचनेवाले आदमी कम मिलते हैं । दोनोंका अजीर्ण हुआ रहता है । दरिद्रताका भी अभिमान हो जाता है । साधारण लोग कहते हैं‒सेठ हैं, तो अपने घरकी सेठानीके हैं । हम क्या धरावें सेठ है तो ?’ यह बहुत ही खराब है । भगवान् ही बचाये तो आदमी बचता है, नहीं तो हरेक हालतमें अभिमान आ जाता है । इसलिये अभिमानसे सदा सावधान रहना चाहिये ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.२०७१, गुरुवार
मानसमें नाम-वन्दना



(गत ब्लॉगसे आगेका)

संतने सोचा कि इसे ठीक करना है । तो वे वैसे ही सेठ बन गये और सेठ बनकर घरपर चले गये । दरवानने कहा कि आज आप जल्दी कैसे आ गये ?’ तो उन्होंने कहा कि एक बहुरूपिया मेरा रूप धरके वहाँ आ गया था, मैंने समझा कि वह घरपर जाकर कोई गड़बड़ी नहीं कर दे । इसलिये मैं जल्दी आ गया । तुम सावधानी रखना, वह आ जाय तो उसे भीतर मत आने देना ।

सेठ घरपर जैसा नित्य-नियम करता था, वैसे ही वे सेठ बने हुए संत भजन-पाठ करने लग गये । अब वह सेठ सदाकी तरह धोती और लोटा लिये आया तो दरवानने रोक दिया । कहाँ जाते हो ? हटो यहाँसे !सेठ बोला‒तूने भाँग पी ली है क्या ? नशा आ गया है क्या ? क्या बात है ? तू नौकर है मेरा, और मालिक बनता है ।दरवानने कहा‒‘हट यहाँसे, नहीं जाने दूँगा भीतर ।सेठने छोरोंको आवाज दी‒‘आज इसको क्या हो गया ?’ तो उन्होंने कहा‒‘बाहर जाओ, भीतर मत आना ।बेटे भी ऐसे ही कहने लगे । जिसको पूछे, वे ही धक्का दें । सेठने देखा कि क्या तमाशा हुआ भाई ? मुझे दरवाजेके भीतर भी नहीं जाने देते हैं । बेचारा इधर-उधर घूमने लगा ।

अब क्या करें ? उसकी कहीं चली नहीं तो उसने राज्यमें जाकर रिपोर्ट दी कि इस तरह आफत आ गयी । वे सेठ राज्यके बड़े मान्य आदमी थे । राजाने उनको जब इस हालतमें देखा तो कहा‒‘आज क्या बात है ? लोटा, धोती लिये कैसे आये हो ?’ तो वह बोला‒‘कैसे-कैसे क्या, महाराज ! मेरे घरमें कोई बहुरूपिया बनकर घुस गया और मुझे निकाल दिया बाहर ।राजाने कहा‒‘चार घोड़ोंकी बग्घीमें आया करते थे, आज आपकी यह दशा !राजाने अपने आदमियोंसे पूछा‒‘कौन है वह ? जाकर मालूम करो ।घरपर खबर गयी तो घरवालोंने कहा कि  अच्छा ! वह राज्यमें पहुँच गया ! बिलकुल नकली आदमी है वह । हमारे सेठ तो भीतर विराजमान हैं । राजाको जाकर कहा कि वह तो घरमें अच्छी तरहसे विराजमान है । राजाने कहा‒‘सेठको कहो कि राजा बुलाते हैं ।अब सेठ चार घोड़ोंकी बग्घी लगाकर ठाट-बाटसे जैसे जाते थे, वैसे ही पहुँचे और बोले‒‘अन्नदाता ! क्यों याद फरमाया, क्या बात है ?’

राजाजी बड़े चकराये कि दोनों एक-से दीख रहे हैं । पता कैसे लगे ? मंत्रियोंसे पूछा तो वे बोले‒‘साहब, असली सेठका कुछ पता नहीं लगता ।तब राजाने पूछा‒आप दोनोंमें असली और नकली कौन हैं ?’ तो कहा‒परीक्षा कर लो ।जो सन्त सेठ बने हुए थे उन्होंने कहा‒बही लाओ । बहीमें जो लिखा हुआ है, वह हम बता देंगे ।बही मँगायी गयी । जो सेठ बने हुए संत थे, उन्होंने बिना देखे ही कह दिया कि अमुक-अमुक वर्षमें अमुक मकानमें इतना खर्चा लगा, इतना घी लगा, अमुकके ब्याहमें इतना खर्चा हुआ । वह हिसाब अमुक बहीमें, अमुक जगह लिखा हुआ है ।वह सब-का-सब मिल गया । सेठ बेचारा देखता ही रह गया । उसको इतना याद नहीं था । इससे यह सिद्ध हो गया कि वह सेठ नकली है । तो कहा कि‒इसे दण्ड दो ।पर संतके कहनेसे छोड़ दिया ।

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आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी, वि.सं.२०७१, बुधवार
मानसमें नाम-वन्दना



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धनके अभिमानके विषयमें कविने विचित्र बात कही है‒

हाकम जिन दिन  होय  विधि  षट्  मेख  बनावे ।
दोय  श्रवणमें  दिये  शबद   नहीं  ताहि  सुनावे ॥
एक मेख मुख माय   विपति  किणरी  नहीं  बूझे ।
दोय मेख चख मांय   सबल  निरबल  नहीं  बूझे ॥
पद हीन होय हाकम  परो छठी मेख तल द्वार में ।
पांचों ही मेख  छिटके परी  सरल  भये  संसारमें ॥

जब आदमी बड़ा हो जाता है, तो वह किसीकी कुछ सुनता नहीं, उसको दीखता नहीं और वह गूँगा हो जाता है । उसके छः प्रकारकी मेख लग जाती है । दो मेख कानमें लगती हैं, जिससे शब्द सुनायी नहीं देता । कोई पुकार करे कि अन्नदाता ! हमारे अमुक आफत आ गयी, आप कृपा करो, हमारे ऐसा बड़ा दुःख है ।कानसे बात सुननेमें आनी चाहिये न ? परंतु वह सुनवायी करता ही नहीं, कानमें मेख लग गयी, अब सुने कहाँसे ? ऐसे ही दो और मेख आँखोंमें लगनेसे सबल निरबल नहीं बूझे’ ‘दे दो दण्ड इसको, जुर्माना लगा दो इतना !’ ‘अरे भाई ! कितना गरीब है, कैसे दे सकेगा ?’ ‘कैद कर दो’शब्दमात्र कहते क्या जोर आया ? और एक मेख मुख माय विपति किणरी नहीं बूझेदुःखी हो कि सुखी, क्या हो, तुम्हारी दशा कैसी है ? तुम्हारे कोई तकलीफ तो नहीं है‒ऐसी बात पूछता ही नहीं । ये मेखें खुल जाती हैं फिर सरल भये संसारमेंतब वह सीधा सरल हो जाता है ।

संतद्वारा सेठको शिक्षा

एक सेठकी बात सुनी । वह सेठ बहुत धनी था । वह सुबह जल्दी उठकर नदीमें स्नान करके घर आकर नित्य-नियम करता था । ऐसे वह रोजाना नहाने नदीपर आता था । एक बार एक अच्छे संत विचरते हुए वहाँ घाटपर आ गये । उन्होंने कहा‒सेठ ! राम-राम !वह बोला नहीं तो फिर बोले‒सेठ ! राम-राम !ऐसे दो-तीन बार बोलनेपर भी सेठ राम-रामनहीं बोला । सेठने समझा कि कोई मँगता है । इसलिये कहने लगा‒‘हट ! हट ! चल, हट यहाँसे ।संतने देखा कि अभिमान बहुत बढ़ गया है, भगवान्‌का नाम भी नहीं लेता । मैं तो भगवान्‌का नाम लेता हूँ और यह हट कहता है ।

इन धनी आदमियोंके वहम रहता है कि हमारेसे कोई कुछ माँग लेगा, कुछ ले लेगा । इसलिये धनी लोग सबसे डरते रहते हैं । वे गरीबसे, साधुसे, ब्राह्मणसे, राज्यसे, चोरोंसे, डाकुओंसे डरते हैं । अपने बेटा-पोता ज्यादा हो जायँगे तो धनका बँटवारा हो जायगा‒ऐसे भी डर लगता है उन्हें ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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