।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी, वि.सं.२०७१, शुक्रवार

मानसमें नाम-वन्दना


                  
               

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

एकान्तमें दो-तीन दिनतक वेश्या बैठी रही, फिर भी हरिदासजीका मन नहीं चला‒इसमें कारण क्या था ?  ‘रामनामका जो रस है, वह भीतरमें आ गया । अब बाकी क्या रहा ! सज्जनो ! संसारके रससे सर्वथा विमुख होकर जब भगवन्नाम-जपमें प्रेमपूर्वक लग जाओगे, तब यह भजनका रस स्वतः आने लगेगा । इसलिये रामनाम रात-दिन लो, कितनी सीधी बात है !

नाम लेने का मजा जिसकी जुबाँ पर आ गया ।
वो जीवन्मुक्त हो गया  चारों पदार्थ पा गया ॥

किसी व्यापारमें मुनाफा कब होता है ? जब वह बहुत सस्तेमें खरीदा जाय, फिर उसका भाव बहुत मँहगा हो जाय, तब उसमें नफा होता है । मान लो, दो-तीन रुपये मनमें अनाज आपके पास लिया हुआ है और भाव चालीस, पैंतालीस रुपये मनका हो गया । लोग कहते हैं, अनाजका बाजार बड़ा बिगड़ गया, पर आपसे पूछा जाय तो आप क्या कहेंगे ? आप कहेंगे कि मौज हो गयी । आपके लिये बाजार खराब नहीं हुआ । ऐसे ही रामनाम लेनेमें सत्ययुगमें जितना समय लगता था, उतना ही समय अब कलियुगमें लगता है । पूँजी उतनी ही खर्च होगी और भाव होगा कलियुगके बाजारके अनुसार । कितना सस्ता मिलता है और कितना मुनाफा होता है इसमें ! कलियुगमें नामकी महिमा विशेष है ।

भगवन्नाममें शक्ति

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ ।
कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥

नाम्नामकारि  बहुधा  निज    सर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः ॥

श्रीचैतन्य-महाप्रभुने कहा है कि नाममें भगवान्‌ने अपनी सब-की-सब शक्ति रख दी । अनेक साधनोंमें जो शक्ति है, सामर्थ्य है, जिन साधनोंके करनेसे जीवका कल्याण होता है, कलियुगको देखकर भगवान्‌ने भगवन्नाममें उन सब साधनोंकी शक्ति रख दी । जो अनेक साधनोंमें ताकत है, वह सब ताकत नाम महाराजमें है । इसे स्मरण करनेके लिये समयका प्रतिबन्ध भी नहीं है । सुबह, दोपहर या रातमें, किसी समय जप करें । ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही करें, दूसरे न करें, भाई लोग जप करें, माता-बहनें न करें’ऐसा कोई नियम नहीं है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, वि.सं.२०७१, गुरुवार
श्रीराम-विवाह, श्रीस्कन्दषष्ठी-व्रत

मानसमें नाम-वन्दना


                  

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

संत-संगकी महिमा

श्रीचैतन्य-महाप्रभुके कई शिष्य हुए हैं । उनमें एक यवन हरिदासजी महाराज भी थे । वे थे तो मुसलमान, पर चैतन्य-महाप्रभुके संगसे भगवन्नाममें लग गये । सनातन धर्मको स्वीकार कर लिया । उस समय बड़े-बड़े नवाब राज्य करते थे, उनको बड़ा बुरा लगा । लोगोंने भी शिकायत की कि यह काफिर हो गया । इसने हिन्दूधर्मको स्वीकार कर लिया । उन लोगोंने सोचा‒इसका कोई-न-कोई कसूर हो तो फिर अच्छी तरहसे इसको दण्ड देंगे ।’

एक वेश्याको तैयार किया और उससे कहा‒यह भजन करता है, इसको यदि तू विचलित कर देगी तो बहुत इनाम दिया जायगा ।’ वेश्याने कहा‒पुरुष जातिको विचलित कर देना तो मेरे बायें हाथका खेल है ।’ ऐसे कहकर वह वहाँ चली गयी जहाँ हरिदासजी एकान्तमें बैठे नाम-जप कर रहे थे । वह पासमें जाकर बैठ गयी और बोली‒महाराज, मुझे आपसे बात करनी है ।हरिदासजी बोले‒मुझे अभी फुरसत नहीं है ।ऐसा कहकर भजनमें लग गये । ऐसे उन्होंने उसे मौका दिया ही नहीं । तीन दिन हो गये, वे खा-पी लेते और फिर हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥’ मन्त्र-जपमें लग जाते । ऐसे वेश्याको बैठे तीन दिन हो गये, पर महाराजका उधर खयाल ही नहीं है, नाममें ही रस ले रहे हैं । अब उस वेश्याका भी मन बदला कि तू कितनी निकृष्ट और पतित है । यह बेचारा सच्चे हृदयसे भगवान्‌में लगा हुआ है इसको विचलित कर नरकोंकी ओर तू ले जाना चाहती है, तेरी दशा क्या होगी ? इतना भगवन्नाम सुना, ऐसे विशुद्ध संतका संग हुआ, दर्शन हुए । अब तो वह रो पड़ी एकदम ही महाराज ! मेरी क्या दशा होगी, आप बताओ ?’

जब महाराजने ऐसा सुना तो बोले‒हाँ हाँ ! बोल अब फुरसत है मुझे । क्या पूछती हो ?’ वह कहने लगी‒मेरा कल्याण कैसे होगा ? मेरी ऐसी खोटी बुद्धि है, जो आप भजनमें लगे हुएको भी नरकमें ले जानेका विचार कर रही थी । मैं आपको पथभ्रष्ट करनेके लिये आयी । नवाबने मुझे कहा कि तू उनको विचलित कर दे, तेरेको इनाम देंगे । मेरी दशा क्या होगी ?’ तो उन्होंने कहा तुम नाम‒जप करो, भगवान्‌का नाम लो ।

फिर बोली-‒अब तो मेरा मन भजन करनेका ही करता है, भविष्यमें कोई पाप नहीं करूँगी, कभी नहीं करूँगी ।हरिदासजीने उसे माला और मन्त्र दे दिया ।  अच्छा यह ले माला ! बैठ जा यहाँ और कर हरि भजन ।उसे वहाँ बैठा दिया और वह‒हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥ इस मन्त्रका जप करने लगी । हरिदासजीने सोचा‒यहाँ मेरे रहनेसे नवाबको दुःख होता है तो छोड़ो इस स्थानको और दूसरी जगह चलो ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.२०७१, बुधवार

मानसमें नाम-वन्दना


                 

 (गत ब्लॉगसे आगेका)

बिना  बिचारे  जो  करे  सो पाछे पचछताय,
काज  बिगारे  आपना  जगमें  होत  हँसाय ।
जगमें  होत  हँसाय  चित्तमें  चैन   न   पावे,
राग रंग  सन्मान  ताहिके  मन  नहिं  भावे ।
कह गिरधर कविराय करम  गति टरे न टारे,
खटकत है हिय माँहि करे जो बिना बिचारे ॥

बिना विचार किये काम करनेसे आगे दुःख पाना पड़ता है और वह बात हृदयमें भी खटकती रहती है । मनुष्य अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग कर दे और दूसरोंके हितके लिये काम करे तो उसका जीवन सफल हो जाय । सात्त्विक वृत्तियोंकी मुख्यता रखकर अर्थात् विचारपूर्वक प्रत्येक कार्य करना चाहिये । लोग भोजन करते हैं तो दुःख, शोक और रोग देनेवाले राजसी भोजनमें प्रवृत्त होते हैं । जान-बूझकर कुपथ्य कर लेते हैं । छोटे-से जीभके टुकड़ेके वशमें होकर साढ़े तीन हाथके शरीरका नुकसान कर लेते हैं । अगर विवेक होता तो शरीरका नाश क्यों कर लेते ? इतना ही नहीं, अभक्ष्य-भक्षण करके नरकोंकी तैयारी कर लेते हैं ।

रामनामकी महिमा कहते हुए गोस्वामीजी कहते हैं‒सुगति रूपी जो सुधा है, यह सदाके लिये तृप्त करनेवाली है । सदाके लिये लाभ हो जाय, जिस लाभके बादमें कोई लाभ बाकी नहीं रहता, जहाँ कोई दुःख पहुँच ही नहीं सकता है । ऐसे महान् आनन्दको प्राप्त करानेवाली जो श्रेष्ठ गति है, उसका रस रामनामका जप करनेसे आता है । जो रामनामसे तृप्त हो जाते हैं, वे फिर सांसारिक भोगोंमें फँसेंगे नहीं । उनसे कहना नहीं पड़ेगा कि पाप-अन्याय मत करो । उनकी पाप-अन्यायमें रुचि रहेगी ही नहीं । जिनको भगवन्नामका रस नहीं मिला है, वे धन इकट्ठा करने और भोग-भोगनेमें लगे हैं ।

सज्जनो ! माताओ-बहनो ! भगवान्‌के नाममें रस लो, इसमें तल्लीन हो जाओ । रात-दिन इसमें लग जाओ । आप-से-आप पाप-अन्याय छूट जायगा । निषिद्ध आचरणोंसे स्वतः ही ग्लानि हो जायगी । अभी मलिनता अच्छी लगती है, बुरी नहीं लगती, कारण क्या है ? अन्तःकरण मैला है । जो खुद मैला है, उसे मैली चीज ही अच्छी लगेगी । मक्खियाँ मिठाईपर तभीतक बैठी रहती हैं कि जबतक मैलेकी टोकरी पाससे होकर न निकले । मुँहपर मक्खियाँ बैठने लगें तो बढ़िया सुगन्धवाला इत्र थोड़ा-सा लगा लो फिर मक्खियाँ नहीं आयेंगी; क्योंकि उनको सुगन्धि सुहाती ही नहीं । मक्षिका व्रणमिच्छन्तिवे तो घावपर जहाँ पीप-खून मिले, वहाँ बैठेंगी । ऐसे ही जिसका मन अशुद्ध होता है, वह ही मलिन वस्तुओंकी तरफ आकृष्ट होता है । भगवान्‌के नाम-रूपी सुगन्धके मिलनेपर फिर मैली वस्तुओंकी तरफ मन नहीं जायगा ।

सज्जनो ! यह बड़ा सुगम उपाय है । भगवान्‌के नामका जप करो और प्रभुके चरणोंका सहारा रखो । जैसे साधारण मनुष्य धन कमाने और भोग-भोगनेमें रस लेते हैं, वैसे ही भगवत्प्रेमीको भगवन्नाम, सत्संग और सत्-शास्त्रोंके अध्ययनमें रस लेना चाहिये । इस रसके लिये ही मानव जीवन मिला है जिसे रामनाम लेनेमें रस आने लगेगा, वह रात-दिन नाम-जपमें लग जायगा, फिर वह संसारके विषयोंमें फंसेगा ही कैसे ?

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया, वि.सं.२०७१, मंगलवार

मानसमें नाम-वन्दना



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प्रवचन‒ ४

अमृतमय  ‘रामनाम

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के ।
कमठ सेष सम  धर  बसुधा  के ॥
                                                    (मानस, बालकाण्ड, दोहा २० । ७)

जीवका कल्याण हो जाय, इससे ऊँची कोई गति नहीं है । ऐसी जो श्रेष्ठ गति (मुक्ति) है, उसको सुगति कहते हैं, परम सिद्धि भी वही है, जो इस रामनामसे प्राप्त हो जाती है । स्वाद तोष समअमृतके स्वाद और तृप्तिके समान रामनाम है । जैसे, भोजन किया जाता है तो उसमें बढ़िया रस आता है । भोजन करनेके बादमें तृप्ति और सन्तोष होता है, ऐसे ही यह रामनाम सुगति और सुधाके स्वाद और तोष (तृप्ति) के समान है । मानो मधुरिमा और सन्तोष है । राकहते ही मुख खुलता है और कहते ही बन्द होता है । भोजन करते समय मुख खुलता है और तृप्ति होनेपर मुख बन्द हो जाता है । इस प्रकार राऔर अमृतके स्वाद और तोषके समान हैं ।

भोजनकी परीक्षाके लिये जीभपर रस लेकर तालुसे लगानेपर पता लग जाता है कि उसमें रस कैसा है । जहाँसे रस लिया जाता है, वहाँसे ही का उच्चारण होता है । कहनेमें सुधाका स्वाद आता है और कहनेमें तोष हो जाता है । राम, राम, राम ऐसे कहते हुए एक बहुत विलक्षण रस आता है । उससे सदाके लिये तृप्ति हो जाती है । नाममें रस आनेपर फिर दूसरे रसोंकी जरूरत नहीं रहती । जिनको भगवन्नाममें रस आ जाता है, उनकी संसारके विषयोंसे रुचि हट जाती है । जबतक संसारके विषयोंकी रुचि रहती है, तबतक भगवन्नाममें रस नहीं आता है । भगवान्‌के नाममें जब रस आना शुरू हो जाता है, फिर सब रस फीके हो जाते हैं ।

श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं‒यदि रामनाम मेरेको मीठा लगता तो सब-के-सब रस फीके हो जाते। भोजनके छः रस और काव्यके नौ रस होते हैं । ये सब फीके हो जाते हैं; क्योंकि ये सब बाह्य हैं । उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थोंसे मिलनेवाला रस नीरसतामें बदल जाता है । विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्संसारमें जितने रस हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले हैं । वे आरम्भमें अमृतके समान लगते हैं, परंतु परिणामे विषमिवपरिणाममें जहरकी तरह होते हैं । इस तरफ विचार न करनेसे मनुष्य विषयोंमें फँसता है । जो विचारवान् सात्त्विक पुरुष होते हैं, वे पहले परिणामकी तरफ देखते हैं, इस कारण वे फँसते नहीं ।

                            सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं
                                  सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम् ।

सज्जनो ! ये बातें ऐसे ही केवल कहने-सुननेकी नहीं हैं, समझनेकी हैं और समझकर काममें लानेकी हैं । आदमीको सोच-समझकर काम करना चाहिये । विचारपूर्वक काम करनेवालेको परिणाममें कष्ट नहीं उठाना पडता ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे

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