।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण एकादशी, वि.सं.२०७१, शुक्रवार
इन्दिरा एकादशी-व्रत, एकादशीश्राद्ध
संसारमें रहनेकी विद्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

          इसलिए आप अपने माता-पिताका, सास-ससुरका आदर करो, सेवा करो, सत्कार करो तो आपका असर पड़ेगा बालकोंपर । वृद्धावास्थामें भी आपकी सेवा करेंगे । परन्तु आप ऐसा नहीं करोगे, अपने माइतोंकी सेवा नहीं करोगे तो बालकोंपर भी ऐसा असर पड़ेगा । उनका स्वाभाव भी ऐसा ही बनेगा । आप सदा ही ऐसे नहीं रहोगे, जीते रहोगे तो बूढ़े भी होओगे । उस समय वे सेवा नहीं करेंगे, फिर आप कहेंगे कि ये सेवा नहीं करते, बात नहीं मानते । तो तुमने अपने माइतों-(बड़ों-) की सेवा कितनी की ? अब तुम क्यों आशा रखो ? इसलिए अपना आचरण अच्छा बनाओ ।

          आजकल तो माँ-बाप बच्‍चोंको व्यसन सिखाते हैं, खेल सिखाते हैं । चाय पिलाते है, छोटे-छोटे छोरोंको । आजकल छोरा दूध नहीं पी सकते, मलाई आ जाय तो घृणा करते हैं । बड़े आश्चर्यकी बात है ! हमें तो बचपनकी बात याद है, दूध पीना होतो कहते थे कि क्या है इसमें, तारा (घीकी बूँदें) तो है ही नहीं ! आजकल घी तो कौन पी सके, हिम्मत ही नहीं है । वे मलाई ही नहीं खा सकते, चाय पीते हैं । राम ! राम ! राम ! चायसे माथा खराब हो जाय, नींद आवे नहीं । स्वास्थ्य बिगड़ जाय, आँखें खराब हो जायँ, दवाई लगे नहीं और पैसा लगे ज्यादा मुफ्तमें । यह दशा हो रही है, तो भाई ! ऐसा मत करो । गायोंका पालन करो, उनकी रक्षा करो । आपका जो गाँव है, क़स्बा है, अकाल पड़ जाय तो गायोंके लिये आप खर्च करो तो बड़ा अच्छा है । मोटर आप रख लेते हो धुएँके लिये और गायें नहीं रख सकते । कुत्ता-पालन तो कर लेंगे, गौऊका पालन नहीं करेंगे । वाह ! वाह ! वाह ! रे कलियुग महाराज ! आपने लिया अजब दिखायी ! यह दशा हो रही है ।

     —‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण दशमी, वि.सं.२०७१, गुरुवार
दशमीश्राद्ध
संसारमें रहनेकी विद्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

          गायका दूध पीते हैं, उसे छानते हैं कि कहीं रूआँ (बाल) न आ जाय । दूध तो प्रसन्नतासे दिया जाता है, बाल टूटनेसे खून आता है खून । बाल आ जाय तो क्या हर्ज है ? अरे रूआँ एक भी टूटेगा तो गौ माताको दुःख होगा । अतः दुःख देकर ली हुई चीज बड़ी अनिष्टकारी होती है । लड़केवालोंको कहना चाहिये कि हम धन नहीं लेंगे, हम तो केवल कन्या लेंगे । कन्या-दान लेते हैं, कन्या-दान लेना भी तो दान है, बड़ा भारी दान है ! क्यों लेते हैं ? अभी हम लेंगे तो आगे भगवान् हमें पुत्री देगें तो हम भी कन्या दान करेंगे । ऐसा रिवाज है कि दहेजकी चीजें घरमें नहीं रखते, उसे कुटुम्बमें, परिवारमें लगा देते हैं । बेटीको, ब्राह्मणोंको, सबको बाँट देते हैं । घरमें कोई चीज न रह जाय, ऐसे मिठाई आदि बाँटते हैं । अपनेपर तो कर्जा नहीं रहा और लोग सब राजी होते हैं ।

          शादीके बाद बहूके पीहरसे कोई चीज आती है तो सास आदि उसकी निन्दा करती हैं कि क्या चीज भेजी ? बहूरानी सुन रही है, उसको लगे बुरा । भला माँकी निन्दा किसीको अच्छी लगेगी ? माँकी निन्दासे हृदयमें दुःख होता है । बादमें जब वह हो जायगी मालिकन तो जो चाहेगी वही होगा । इसलिए उसे प्यार करो, स्नेह करो, राजी रखो, बहूके घरसे जो आया उसमें अपने घरसे मिलाकर बाँटो । लोगोंसे कहो कि ऐसा बहुत आया है । तो बहूकी माँकी हो जायगी बड़ाई, इससे बहू खुश हो जायगी । आप कहेंगे कि रुपया लगता है, पर बीस-पचास रुपये और लगानेसे आदमी अपना हो जायगा । बहू आपकी हो जायगी । सदाके लिये खरीदी जायगी । सौ-पचास रुपएमें कोई आदमी ख़रीदा जाय तो कोई महँगा है ? सस्ता ही पड़ेगा, गहरा विचार करो । व्यवहार भी अच्छा रहेगा, प्रेम भी बढ़ेगा । बहू भी राजी होगी कि मेरी सासने मेरी माँकी महिमा की है । इतना खर्च किया, उसका उम्रभर असर पड़ेगा; इसलिए भाई ! थोडा-सा त्याग करो, उसका फल बड़ा अच्छा होगा ।

          जो वस्तुएँ मिली हैं उनका सदुपयोग किया जाय । लड़के-लड़कीका ठीक तरहसे पालन किया जाय, अच्छी शिक्षा दी जाय । उनके अच्छे भाव बनाये जायँ, सद्गुणी और सदाचारी बनें । पैसे कमानेमें तो आपको समय रहता है, परन्तु बच्‍चे क्या कर रहे हैं, कैसे पल रहे हैं, क्या शिक्षा पा रहे हैं, इन बातोंकी तरफ आप खयाल ही नहीं करते । अरे भाई ! यह सम्पत्ति है असली । यह मनुष्य महान् हो जायगा । कितनी बढ़िया बात होगी ! जितने-जितने महापुरुष हुए हैं, उनकी माताएँ बड़ी श्रेष्ठ हुई हैं । ऐसी माताओंके बालक बढ़िया हुए हैं, संत-महात्मा हुए हैं । माँका स्वभाव आता है बालकोंमें, इस कारण माताओंको चाहिये कि बालकोंको अच्छी शिक्षा दें । परन्तु शिक्षा देती हैं उलटी, लड़कियोंको सिखाती हैं कि अपना धन तो रखना अपने पासमें । जब अलग होगी तो वह धन तेरे पासमें रह जायगा और ऐसे सिखाकर भेजती हैं कि ससुरालमें काम तू क्यों करे, तेरी जेठानी करे, ननद करे । तू काम मत किया कर । अब वहाँ कलह होगी, खटपट मचेगी । आपके बहू आयेगी, वह भी अगर ऐसी सीखी हुई आ जायगी तो वह भी ऐसा ही करेगी, काम नहीं करेगी । फिर आप कहेंगी कि हमारी बहू काम नहीं करती । आप अच्छा करो तो आपके लिये अच्छा होगा । बुरा करो तो बुरा होगा भाई !

                              कलियुग है इस हाथ दे, उस हाथ ले,
                                                              क्या खूब सौदा नगद है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण नवमी, वि.सं.२०७१, बुधवार
नवमीश्राद्ध, मातृनवमी, श्रीविश्वकर्मापूजा
संसारमें रहनेकी विद्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

          एक लड़कीकी बात हमने सुनी । उस लड़कीकी शादी हो गयी । लड़की थी गरीब घरकी, लड़केवालोंने पैसा माँगा ज्यादा । उसका जी ऊब गया । लड़कीकी बड़ी अवस्था हो गयी थी । उसने कहा, पिताजी ! आप उधार लेकर उनसे विवाह कर दीजिये, अभी कोई बात नहीं, फिर मैं ठीक कर लूँगी । परन्तु आप मेरे लिये दान रूपसे मत देना । कन्याको उधर देता हूँ, ऐसा देना । कर दी शादी, शादी करनेके बाद धन खूब दिया । शादीके बाद वह गयी ससुरालमें तो खाटपर बैठ गयी और पतिसे कहा –‘लाओ मेरी जूती लाओ ।’

          ‘तेरी जूती मैं उठाऊँ !’ आश्चर्यसे पूछा ।

‘मेरे बापने पैसा दिया है, आपको ख़रीदा है । पता है कि नहीं ?’

          ‘कितने रुपये लगे ?’

          ‘हजारों रुपये लगे हैं ।’ कन्याने उत्तर दिया ।

          अब उस लड़केने भोजन नहीं किया । माँने पूछा क्या बात है ? ‘माँ ! मेरी जो स्त्री आयी है वह यहाँतक कहती है कि मेरी जूती उठाकर लाओ ।’

          ‘बहू ! ऐसा क्यों कहती हो ?’ माँने पूछा ।

          ‘हमारे बापने इतना खर्चा किया है, कर्जा लेकर खर्च किया है, इसलिए यह नौकर है हमारा, इसे लाना पड़ेगा ।’

          लड़केने कहा–‘मैं तो जूती नहीं उठाऊँगा, अगर ऐसी बात है तो मैं रोटी नहीं खाऊँगा ।’

          मेरे बापके नौकर हो, मेरे बापने पैसे दिये हैं । पता है कि नहीं । ऐसे मुफ्त आये हैं क्या आप ! इतना इन्तजाम किया है, सोलह हजार रुपये उधार लिये थे ।’

          इस प्रकार कहने-सुनानेसे लड़केवालोंने रूपया वापिस किया और लड़की बहूकी तरह रहने लगी । कन्याएँ लज्जाकी मूर्ति हैं । इनका इस प्रकार तिरस्कार करना, समाजमें बड़ा अपमान होता है ।

          बड़े दुःखकी बात है ! खर्चा तो पूरा करते हो, फिर काम नहीं चलता तो बेईमानी करते हो । बड़े अन्यायकी बात है । इसका नतीजा खराब होगा । जो अन्याय करते हैं उनकी आत्माको शान्ति नहीं मिलेगी । जो धन दुःख देकर लिया जायगा, वह धन आकर आग लगायेगा ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण अष्टमी, वि.सं.२०७१, मंगलवार
अष्टमीश्राद्ध, जीवत्पुत्रिका-व्रत
संसारमें रहनेकी विद्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

          कुछ लोग कहते हैं कि पहले जो पाप कर लिया, वह पाप तो हो ही गया, कलंक तो लग ही गया; अब धन क्यों छोड़ें ? यह बुद्धिमानी है क्या ? अरे भाई ! जैसे आप भोजन करने लगे । आपसे कहे कि यह क्या कर रहे हो ? इसमें जहर मिला है । आप यह नहीं कहेंगे कि आपने पहले नहीं कहा, अब तो खायेंगे ही । तुरंत हाथके भोजन फेंक देंगे और उलटी करना शुरू करोगे, खाया हुआ भी निकल जाय तो बड़ा अच्छा है ।

          श्रोता–महाराज ! आपको पता नहीं । आजकल झूठ-कपटके बिना निर्वाह नहीं हो सकता । कानून ऐसा बन गया, संसार ऐसा ही हो गया । इसलिए इसके बिना काम नहीं चलता ।

          स्वामीजी–अच्छा भाई ! काम चलाओ, कितने दिन चलाओगे ? बीस वर्ष, पचास वर्ष, सौ वर्ष; कितने दिन चलाओगे ? इतना तो समय ही नहीं मिलता ।

           श्रोता–अगर नहीं कमायेंगे तो मर जायेंगे ।

          स्वामीजी–क्या हर्ज है भाई ! आज बिना पापके मर जाओ । बादमें भी मरना तो है ही, साथमें पापकी गठरी बाँधकर क्या करोगे ? अरे भाई ! बिना पाप ही मर जाओ, क्या हर्ज है ? पाप करनेके लिये मानव-शरीर मिला है क्या ? पाप नहीं करेंगे, अन्याय नहीं करेंगे; भगवान्‌की तरफ बढ़ेंगे–इस प्रकार निश्चय करके बहुत-से लोगोंने मुक्ति पायी है । भाई ! समय अच्छे काममें लगाओ, उत्तम काम करो । नीचा काम मत करो । हर भाई-बहिनको चाहिये कि पाप नहीं करें । अंतःकरणको निर्मल रखो । यह जीवन पवित्र हो जाय, इसलिए यह मानव-शरीर मिला है । अतः उत्तम-से-उत्तम काममें लगे रहना है । अन्यायपूर्वक काम नहीं करना है । ईमानदारीसे अपना जीवन-निर्वाह कर लेना है ।

          आजकल शादीमें लड़कोंकी नीलामी होती है नीलामी ! लड़कीका पिता बेचारा स्वयं तो शर्माता है, दूसरोंसे कहता है कि उनके लड़का है, आप बात करो कि हमारी कन्यासे सम्बन्ध कर लें । पूछते हैं, अमुककी लड़की है, आप सम्बन्ध कर लो । जवाबमें, पन्द्रह हजार रुपये कीमत । राम ! राम ! राम ! आज ऐसी दशा है ! कन्याओंका ऐसा तिरस्कार ! ऐसे स्त्री-जातिका तिरस्कार करना ठीक नहीं । किस बात पर हुआ ? पैसोंके बदले । अरे ! पैसे तो आज हैं कल नहीं । पैसे तो नष्ट होनेवाले हैं । कितनी बड़ी भारी दुःखकी बात है, पैसोंके बदले मनुष्यका तिरस्कार । बड़े पापकी बात है, अन्यायकी बात है । भाइयों और बहिनोंसे कहना है कि लड़का ब्याहना हो तो गरीब घरकी लड़की लो । वह काम-धन्धा करेगी, अच्छा व्यवहार करेगी । बड़े घरकी लड़की काम-धन्धा तो करेगी नहीं, मालिकन बन जायगी ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण सप्तमी, वि.सं.२०७१, सोमवार
सप्तमीश्राद्ध
संसारमें रहनेकी विद्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

          थोड़े समयमें, थोड़े खर्चेमें बढ़िया काम हो जाय, ऐसा स्वाभाव बनाओ तो सब लोग खुश हो जायँ, प्रसन्न हो जायँ । गृहस्थोंसे ऐसी बातें हमने सुनी हैं, जो माताएँ-बहिनें चीजें अच्छी बनाती हैं, उनका सब आदर करते हैं, पर इस बातका अभिमान नहीं करना चाहिये । अभिमान तो पतन करनेवाला होता है । ‘निर्ममो निरहंकारः’, अहंकार तो छोड़ना है । अरे ! काम-धन्धा करके फिर उससे भी अहंकार कर लो ! इसलिये सुन्दर रीतिसे काम करो, सुचारुरूपसे काम करो । मान-बड़ाईके लिये नहीं, रुपये-पैसोंके लिये नहीं, वाह-वाहके लिये नहीं । अपना अन्तःकरण शुद्ध करनेके लिये, निर्मल बनानेके लिये, जिससे भगवान्‌में प्रेम बढ़े । प्रेम बढ़ानेके लिये काम-धन्धा करो, सेवा करो । काममें चातुर्य बढ़ानेसे आपकी माँग हो जायगी ।

          तीसरी बात–व्यक्तिगत खर्चा कम करो । दान-पुण्य करो । बड़े-बूढोंकी रक्षा करो । अभावग्रस्तोंको दो । सेवा करो, पर अपने शरीरके निर्वाहके लिये साधारण वस्त्र, साधारण भोजन, साधारण मकान–उससे अपना निर्वाह करो । भाई-बहिन सबके लिये यह बड़े कामकी बात है । जो खर्चीला जीवन बना लेते हैं, वह पराधीन हो जाता है । खर्चा कम करना हाथकी बात है और ज्यादा पैदा करना हाथकी बात नहीं । आजकल लोग खर्चा तो करते हैं ज्यादा और पैदाके लिये सहारा लेते हैं झूठ-कपट, बेईमानी-धोखेबाजी, विश्वासघातका । इससे क्या अधिक कमा लेते हैं ? अधिक कमा लें यह हाथकी बात नहीं, खर्चा कम करना हाथकी बात है । जो हाथकी बात है, उसे करते नहीं और जो हाथकी नहीं, वह होती नहीं । दुःख पाते रहते हैं उम्रभर । इस बातको समझ लें कि भाई, अपने व्यक्तिगत कम खर्चेसे ही काम चला सकते हैं । बढ़िया-से-बढ़िया माल खा लो और चाहे साधारण दाल-रोटी खा लो, निर्वाह हो जायगा । यदि शरीर बीमार है तो दवाई ले लो । निर्वाहकी दृष्टिसे तो कोई बात नहीं, परन्तु स्वाद और शौकीनीकी दृष्टी ठीक नहीं है । यह बहुत बड़ी गलती है । इससे बचनेके लिये, स्वतन्त्र जीवन बितानेके लिये खर्चा कम करो ।

          धन कमाना आजकल होशियारी कहलाती है । लोग कहते हैं कि बड़ा होशियार है, कितना धन कमा लिया इसने । अरे ! धन क्या कमा लिया ? उम्र गँवा दी । आप मरेंगे तो कौड़ी एक साथ चलेगी नहीं । धन कमानेके कारण जो झूठ-ठगी, बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात आदि अपनाना पडा, वह जमा हुआ है अन्तःकरणमें और धन रह जायगा बैंकोंमें, आलमारियोंमें, बक्सोंमें । यह साथ जायगा नहीं । धन संग्रह करनेमें जो-जो पाप किये वे साथ चलेंगे । तो यह पापकी पोट सिरपर रहेगी, साथ चलेगी । काले बजारसे धन कमा लिया । आयकरकी चोरी कर ली, बिक्रीकरकी चोरी कर ली, बड़ी होशियारी की । किया क्या ? महान् नाश कर लिया, महान् पतन कर लिया । साथ चलनेवाली पूँजी नष्ट कर दी और यहीं छूटनेवाली पूँजी संग्रह कर ली । मरनेपर कुछ साथ नहीं चलेगा । सब धन यहीं धरा रह जायगा । पीछे लोग खायेंगे और दुःख पाओगे आप । नरकोंमें जाना पड़ेगा आपको । यह होशियारी है ? यह कोई समझदारी है ? कितनी बड़ी भारी बेसमझी है, मूर्खता है । तो अब क्या करें ? अब पाप छोड़ दो । अब बेईमानी, ठगी, झूठ-कपट, विश्वासघात, धोखेबाजी नहीं करेंगे । परिश्रम करेंगे, जितना मिलेगा, उसीसे काम चलायेंगे । पाप नहीं करेंगे–यह है चौथी बात ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण षष्ठी, वि.सं.२०७१, रविवार
षष्ठीश्राद्ध
संसारमें रहनेकी विद्या

(गत ब्लॉगसे आगेका)

          एक संतसे किसीने पूछा–महाराज ! आप बीड़ी पीते हो ? तो वे बोले पीते तो नहीं, पर लोग पिला देते हैं । गाड़ीमें बैठते हैं, लोग फूँक मारते हैं । अब क्या करें ? तो जो नहीं पीना चाहे, उन्हें लोग ऐसे पिला देते हैं । बताओ उन्हें तंग किया, दुःख दिया । कहा है–‘पर हित सरिस धर्म नहीं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥’ दूसरोंको पीड़ा दी, तो आपको क्या मिला ? दूसरोंकी स्वतन्त्रतामें भी बाधा डाल दी और आप सदाके लिए परतन्त्र हो गये, वह भी धुएँके । ऐसे निकम्मे काममें समय लगाया । राम ! राम ! राम !

          यह समय भगवान्‌के लिए लगाओ तो भगवान्‌ मिल जायँ । भक्त बन जाओ । जिनके लिए भगवान्‌ कहते हैं–‘मैं हूँ संतन का दास भगत मेरे मुकुटमणि ।’ मुकुटमणि बन जाते हैं । कौन ? जो भगवान्‌के चरणोंमें समय लगाते हैं, उनका भगवान्‌ भी आदर करते हैं । उन्होंने क्या किया कि अपने समयको भगवान्‌के चरणोंमें लगाया । ऐसा कीमती समय ऐसे नष्ट करनेके लिये है ? ताश खेलनेमें, पत्ते पीटनेमें समय लगा दिया । राम ! राम ! राम ! विद्या-अध्ययन करते, सेवा करते, दूसरोंका उपकार करते तो समयका उपयोग होता । कितना बढ़िया काम होता है । वह समय ऐसे बरबाद कर दिया । यह समय ऐसे नष्ट करनेके लिये नहीं मिला है ।

          हमारी बहिनोंकी दशा क्या है ? इधर-उधरकी बातोंमें समय लगा देती हैं । राम ! राम ! राम ! घरपर कोई बात करनेवाला नहीं मिला तो पड़ोसीके यहाँ बातें करने चली जाती हैं । समय लगा देती हैं । अगर नाम-जप करो, कीर्तन करो, रामायणका पाठ करो, दिनभर राम-राम करो तो निहाल हो जाओगी । मीराबाईकी मुक्ति हो गयी । इसमें कारण क्या था ? भगवान्‌का भजन किया । वह भगवान्‌के भजनमें लग गयी तो आज मीराबाईके पद गाये जाते हैं । भगवान्‌में प्रेम पैदा होता है । कितनी ऊँची हो गयी मीराबाई ! संसारमें प्रसिद्ध हो गयी । उनका कितना ऊँचा नाम ! परन्तु किसीसे यदि पूछो कि मीराकी सासका क्या नाम है ? तो उत्तर मिलता है कि नहीं, पता नहीं । भजन करनेसे जीव बड़ा होता है । अतः अपने समयको श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ काममें लगाओ । समय बरबाद मत करो । यह पहली बात है ।

          दूसरी बात–जो काम करें वह सुचारुरूपसे करें । काम करनेका तरीका, काम करनेकी विद्या बढ़ाते ही चले जाओ । लिखना-पढ़ना, बोलना, रसोई बनाना, कपड़े धोना, सफाई करना, झाड़ू देना, बर्तन आदि साफ करना है । बड़े सफाईसे करो, बड़ी सुन्दर रीतिसे करो । सुचारुरूपसे करनेसे काम अच्छा होगा । नौकरी ही करना है, तो नौकरीका काम ऐसे बढ़िया ढंगसे करो कि जिससे मालिक राजी हो जाय । यदि मालिक कभी नाराज होकर निकाल भी दे तो निकलना तो पड़ेगा, पर आपने वहाँ काम-धन्धा करके जो विद्या हासिल कर ली, क्या वह उस विद्याको छीन लेगा ? नीतिमें आता है कि ब्रह्माजी भी वापिस नहीं ले सकते । काम करनेकी योग्यता है, आपका स्वाभाव है, उसे कोई छीन नहीं सकेगा । वह गुण तो आपके पास रहेगा । वह कितनी बढ़िया बात है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
आश्विन कृष्ण पंचमी, वि.सं.२०७१, शनिवार
पंचमीश्राद्ध
संसारमें रहनेकी विद्या

(गत ब्लॉगसे आगेका)

          मनुष्यको चाहिये कि जहाँ-कहीं रहे अपनी आवश्यकता पैदा कर दे । भाई हो या बहिन हो, साधु हो या गृहस्थ हो, कोई क्यों न हो । अपनी आवश्यकताको जरूर पैदा कर दे, तो वह संसारमें बड़े सुखसे रहेगा । आवश्यकता कैसे पैदा करें ? एक तो हर समय अच्छे-से-अच्छे काममें लगे रहो । यह समय बड़ा कीमती है । इस समयके सामान कोई चीज कीमती नहीं है । आप समय देकर विद्वान बन सकते हैं, परिवारवाले हो सकते हैं । ध्यान दें, समय लगानेसे सब चीजें मिल सकती हैं, परन्तु सब चीजें देनेपर भी समय नहीं मिलता । कोई कहे कि उम्रभरमें जो भी प्राप्त किया एक मिनट समयके लिए सब कुछ देता हूँ, पर उसके बदलेमें एक मिनटका समय भी नहीं मिल सकता । समय देनेसे सब कुछ मिल सकता है; परन्तु सब देनेपर भी समय नहीं मिलता है । समयको कितना कीमती कहें ? भागवतमें आया है–
तुलयाम लवेनापि  न   स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥
                                                 (१/१८/१३)

          भगवान्‌के प्रेमी पुरुषोंका लवमात्रका संग अच्छा है, उससे न तो मुक्तिकी तुलना कर सकते  हैं और न ही स्वर्गकी । गोस्वामीजीने कहा है–
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख   धरिअ  तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥
                                                        (मानस ५/४)

          संतके लवमात्रका संग मिलनेके समान स्वर्ग और मुक्तिकी भी तुलना नहीं हो सकती । समय इतना कीमती है । समय मिले तो इसे बेकार मत जाने दो । इस समयको उत्तम-से-उत्तम, ऊँचे-से-ऊँचे काममें लगाओ । धनकी लोग बड़े आदरके साथ रक्षा करते हैं, तिजोरीमें बन्द कर देते हैं । धन तो तिजोरीमें बन्द हो सकता है, पर समय तिजोरीमें बन्द नहीं हो सकता । समय तो हरदम सावधान होनेसे ही सार्थक होगा । नहीं तो निरर्थक बीत जायगा । जिन लोगोंनें समयका आदर किया है, वे बड़े श्रेष्ठ पुरुष बन गये । वे अच्छे महात्मा बन गये । उन लोगोंने क्या किया है ? जीवनका समय भगवत्-चरणोंमें लगाया है । संसारके भोगोंसे विमुख होकर परमात्म-तत्त्व जाननेके लिये समय लगाया है । वे संत और महात्मा बन गये । समयके बराबर कोई कीमती चीज नहीं है संसारमें । लवमात्रका सत्संग हो जाय, साधु-महात्माका संग हो जाय । भगवान्‌का संग हो जाय, प्रेम हो जाय, भगवान्‌में आकर्षित हो जाय; वह समय सबसे ऊँचा है ।

          अतः इस समयको उत्तम-से-उत्तम काममें खर्च करो । स्वाध्याय करो, जप करो, कीर्तन करो, सेवा करो । अच्छी पुस्तकोंका पठन-पाठन करो । विषय-भोगोंमें, ताश, हँसी-दिल्लगी, नाच-सिनेमा, बीडी-सिगरेट आदिमें समय बरबाद मत करो । बीडी-सिगरेट पीते हैं, चिलम पीते हैं । आप जरा विचार करो, आपके पास जो समय है, उसमें भी आग लगाते हो, धुआँ करते हो । धुआँ हो गया धुआँ ! आपका जो समय है उसमें भी आग लगती है । पाँच-सात मिनट आपने बीड़ी-सिगरेट पी तो उस समयमें भी धुआँ लग गया । पैसे गये, समय गया, स्वतन्त्रता गयी–राम ! राम ! राम ! अरे ! फायदा क्या हुआ ? किसी तरहका फायदा नहीं । जो नहीं पीते हैं, उन्हें आपने गन्दगी दे दी । उनकी नाकमें भी धुआँ चढ़ गया ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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